संपादकीय

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भास्कर संपादकीय: सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक पहल और अनुदार समाज

ऐतिहासिक निर्णय का एलजीबीटी ही नहीं, उदारवादी लोकतांत्रिक समाज को लंबे समय से इंतजार था

Danik Bhaskar

Sep 07, 2018, 12:23 AM IST

देश की सर्वोच्च अदालत ने आखिर समलैंगिकता के संदर्भ में एक ऐतिहासिक और उदार निर्णय दे ही दिया, जिसका एलजीबीटी ही नहीं उदारवादी लोकतांत्रिक समाज को लंबे समय से इंतजार था। इसके बावजूद सवाल यह है कि औपनिवेशिक गुलामी में बुरी तरह जकड़ा और उसी संदर्भ में अपने अतीत की व्याख्या करने पर आमादा समाज क्या उसे दिल से स्वीकार कर पाएगा? भारतीय दंड संहिता की धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों की खंडपीठ ने इस फैसले में न सिर्फ अपने ही 2013 के फैसले को पलट दिया है बल्कि दिल्ली हाईकोर्ट के 2009 के निर्णय को भी स्वीकार कर लिया है।

अदालत ने दो वयस्कों के बीच होने वाले यौन संबंध को अपराध बताने वाली आईपीसी की धारा से बाहर निकालते हुए जो सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं उनकी व्याख्या गहरी और दूर तक जाने वाली है। जरूरत इस समाज और लोकतांत्रिक संस्थाओं को उसे समझने की है। अदालत का कहना है कि व्यक्तिगत आज़ादी महत्वपूर्ण है और यौन अर्थ में भी अलग रुझान का सम्मान होना चाहिए। उससे भी बड़ी बात जो आज के समय के लिए ज्यादा मौजूं है वो यह कि बहुसंख्यकों की नैतिकता को संविधान पर थोपा नहीं जाना चाहिए। अदालत ने इस मामले में न सिर्फ संविधान में वर्णित निजता और समानता के अधिकार की नई व्याख्या की है बल्कि मानसिक स्वास्थ्य कल्याण अधिनियम को भी इस संदर्भ से जोड़ा है। निर्णय में साफ कहा गया है कि समलैंगिकता कोई मनोरोग नहीं है।

दुर्भाग्य से समाज का बड़ा हिस्सा और उसका सांस्कृतिक विमर्श इसी दृष्टिकोण से बंधा हुआ है। विडंबना देखिए कि 1860 में लार्ड मैकाले द्वारा लाए गए आईपीसी के कानून की इस धारा को हटाने में भारतीय समाज को 158 साल लग गए। जबकि यह कानून विक्टोरियाई युग के मूल्यों के आधार पर लाया गया था जिसका मकसद भारतीय समाज को एक तरह की पुरुषवादी मानसिकता में जकड़ना था। हकीकत में भारतीय समाज इतनी विविधता वाला रहा है कि उसने कभी यौन रुझानों के आधार पर समाज में दंड का प्रावधान नहीं किया था। इसलिए अपनी हकीकत को भूल कर औपनिवेशिक मूल्यों में जीने वाले भारतीय समाज के लिए सुप्रीम कोर्ट के इस उदार और प्रगतिशील फैसले को स्वीकार करके उसके मुताबिक आज़ादी का अर्थ समझने की चुनौती है।

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