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महाभारत 2019: भाजपा चाहती है कि नॉर्थ-ईस्ट में लोग गोमांस न खाएं, लेकिन इसे मुद्दा बनाने के पक्ष में नहीं- हेमंत बिस्व सरमा

भास्कर ने नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस के संयोजक सरमा से उनके निवास पर 2019 की रणनीति पर बात की।

धर्मेन्द्र सिंह भदौरिया | Last Modified - Jun 14, 2018, 07:43 AM IST

  • महाभारत 2019: भाजपा चाहती है कि नॉर्थ-ईस्ट में लोग गोमांस न खाएं, लेकिन इसे मुद्दा बनाने के पक्ष में नहीं-  हेमंत बिस्व सरमा
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    नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस के संयोजक हेमंत बिस्व सरमा ने कहा कि भाजपा में सम्मान मिला। कांग्रेस के समय भी मैं यही काम करता था, लेकिन स्वीकृति नहीं थी।

    नई दिल्ली. नॉर्थ-ईस्ट में भाजपा के सबसे बड़े चेहरे और असम में नौ विभागों के मंत्री हैं हेमंत बिस्व सरमा। भास्कर ने महाभारत 2019 के तहत नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस के संयोजक सरमा से उनके निवास पर 2019 की रणनीति पर बात की। बूचड़खानों में गो-हत्या पर भाजपा की नॉर्थ-ईस्ट में चुप्पी के सवाल के जवाब में कहा कि भाजपा चाहती है कि नॉर्थ-ईस्ट में लोग गोमांस न खाएं, लेकिन पार्टी इसे मुद्दा बनाने के पक्ष में नहीं है।

    Q. 2019 के लिए अापका क्या लक्ष्य है?

    A. नॉर्थ-ईस्ट में भाजपा और हमारा गठबंधन है, नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस। मौजूदा परिस्थिति में 25 में से 18-20 लोकसभा सीटें हमारे गठबंधन को मिलना चाहिए।


    Q. अापके लोकसभा चुनाव लड़ने की भी चर्चा है, क्या केंद्रीय राजनीति में जाना चाह रहे हैं?
    A. असम में विधायक के तौर पर मैं 2001 से चुना जा रहा हूं। मंत्री भी हूं। बहुत सारा काम है जो दिल्ली से नॉर्थ-ईस्ट के लिए कर सकते हैं, वो गुवाहाटी से संभव नहीं है। मैं चाहता हूं कि लोकसभा की अधिकतम सीटें यहां से मिलें। अगर चुनाव भी लड़ना पड़ा, तो लड़ लूंगा।


    Q. आपने कहा था कि जब आप राहुल गांधी से मिलने गए तो वे डॉग के साथ समय बिताते रहे, आपसे बात नहीं की। क्या इसीलिए कांग्रेस छोड़ी?
    A. कांग्रेस छोड़ने की वजह यह नहीं थी। तब कांग्रेस विधायक दल में बैचेनी थी। हमने मांग की थी कि मुख्यमंत्री गोगोई साहब को चेंज कर दीजिए। 55 विधायकों ने गोगोई के खिलाफ और 12 ने पक्ष में मत प्रकट किया था। सोनियाजी तो मान गई थीं लेकिन राहुलजी का रवैया एकपक्षीय था। मैं, सीपी जोशी और गोगोई मिलने गए थे। तब राहुल पूरे समय डॉग के साथ खेलते रहे। मैं बात करता रहा, उनका ध्यान ही नहीं था। हमने निश्चय किया कि राहुलजी के साथ काम करने का माहौल नहीं है। फिर हम अलग हो गए।


    Q. आपने असम का मुख्यमंत्री न बन पाने के कारण कांग्रेस छोड़ी, लेकिन यहां भी नहीं बन पाए?
    A. ऐसी बात नहीं है। हमने गोगोईजी को बदलने के लिए पार्टी छोड़ी थी। राहुलजी ने नहीं बदला, तो असम की जनता ने मुख्यमंत्री बदल दिया। मैं अमित शाहजी से मिला था, तब मैंने बोला था कि मुख्यमंत्री बनना उद्देश्य नहीं है। मुझे भाजपा में आने के बाद बहुत सम्मान मिला है। मुख्यमंत्री बनना, न बनना छोटी बात है। आज मैं उससे बहुत ऊपर हूं।


    Q. क्या आप कांग्रेस से बदला ले रहे हैं?
    A. असम विधानसभा चुनाव के वक्त बदले की भावना थी। राहुलजी के ऊपर जो गुस्सा था, शायद उसमें राजनीतिक बदले की भावना थी। आज उनसे कोई घृणा या प्रतिशोध नहीं है। मैं सकारात्मक रूप से बीजेपी के लिए काम कर रहा हूं। कांग्रेस में था, यह भूल चुका हूं।


    Q. आपने दो विधायकों के साथ मेघालय व कम संख्या के बाद भी मणिपुर में भाजपा सरकार बनवाकर पार्टी विद डिफरेंस की पहचान खत्म कर दी?
    A. कांग्रेस ऐसा दुष्प्रचार करती है। यहां कोई जोड़-तोड़ नहीं हुआ। हमारी रणनीति है कि चुनाव के वक्त कोई पार्टी हमारे साथ नहीं आई तो चुनाव के बाद हम साथ आएंगे। यह बात हम आम जनता को प्रचार के समय ही बताते हैं। इसलिए राजनीतिक और नैतिक रूप से यह सही है। इसीलिए हम चुनाव के बाद घंटेभर के अंदर ही सरकार तय कर पाए।


    Q. नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस में ऐसे भी दल हैं, जिनका भाजपा की विचारधारा से लेना-देना नहीं है। क्या विचारधारा से बड़ी सत्ता हो गई है?
    A. जो लोग एनडीए के साथ हैं, वे सारे एंटी कांग्रेस हैं। बीजेपी की विचारधारा से सभी पार्टियां जुड़ें, यह जरूरी नहीं है। कॉमन एजेंडा में हम एक हैं। यह गठजोड़ चुनाव के लिए ही नहीं, राष्ट्रनिर्माण के लिए भी है।


    Q.बूचड़खानों में गो-हत्या पर पूरे देश में विरोध करने वाली भाजपा नॉर्थ-ईस्ट में चुप क्यों है?
    A. नॉर्थ-ईस्ट में जो जनजाति है वो बीफ खाती है। लंबे समय से परंपरा है। यहां वो स्थिति नहीं है कि एक वर्ग बीफ खाता हो, दूसरा नहीं खाता हो, तो उसे दुख होता हो। हम चाहते हैं कि यहां भी गो-हत्या ना हो। लोग गोमांस न खाएं, लेकिन हम इसके लिए जबरदस्ती करने और इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने के पक्ष में नहीं हैं।


    Q. नागरिक संशोधन विधेयक ने असम के मूल निवासियों को ही निर्वासित होने पर विवश कर दिया है। इतना विवाद क्यों हो रहा है?
    A. यहां के मूल निवासियों पर बिल का कोई असर नहीं है। अगर विधेयक पास होता है तो असम में जो बंगाली हिंदू आए हैं, उन्हें नागरिकता मिल जाएगी। हालांकि एक वर्ग का कहना है कि असम में बहुत सारे विदेशियों को भारतीय मान लिया है, अब और दबाव मत बनाइए। असम में वैध नागरिकों की गणना के लिए एनआरसी अपग्रेडेशन जारी है। 30 जून को इसका रिजल्ट आएगा। यहां वास्तव में कितने नागरिक हैं, यह संख्या सामने आएगी। इसके बाद ही निर्णय होगा।


    Q. क्या बिल के सहारे बांग्लादेश के हिंदुओं को राज्य में बसाने की कोशिश हो रही है?
    A. बिल की मूल सोच है कि बांग्लादेश-पाकिस्तान इस्लामिक देश बन गए उसके बाद काफी लोगों को (गैर-मुसलमानों को) धार्मिक भेदभाव का शिकार होना पड़ा है। भारत जब स्वाधीन हुआ था तो नेहरू जी ने कहा था कि आप लोग जब चाहें लौटकर आ सकते हैं। फिलहाल असम में 1971 से अब तक की जांच हो रही है। बांग्लादेशी या पाकिस्तानी मुस्लिमों को नागरिकता देने का सवाल ही पैदा नहीं होता। ये बिल हिंदू, क्रिश्चियन, जैन और बौद्ध के लिए है।


    Q. पिछले चार सालों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण देश में बढ़ा है। असम में भी बढ़ा है?
    A. असम में जो मूल मुस्लिम हैं, 200-300 साल से हैं। उनके साथ ज्यादा विरोधाभास नहीं है। बांग्लादेश से जो मुस्लिम आते हैं, उनके साथ पहचान का मुद्दा है। क्योंकि उनकी संख्या 32 फीसदी तक पहुंच गई है। असम की पहचान इनके कारण खतरे में आ गई है। यहां 16 जिलों में बांग्लादेशी मुस्लिम बहुसंख्यक हैं और हम लोग अल्पसंख्यक हो गए हैं।


    Q. आप बांग्लादेशी मुस्लिमों को राज्य से बाहर करने की बात करते हैं। कैसे करेंगे?
    A. हम राज्य से बाहर नहीं कर रहे। जो गैर-कानूनी तरीके से यहां रह रहे हैं, उन्हें राजनीतिक अधिकार नहीं होने चाहिए। आर्थिक अधिकार कितने मिले? इस पर भी बहस होनी चाहिए।

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