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दुस्साहस पर विवेक का अंकुश होना आवश्यक है- भास्कर मंडे पॉजटिव

बांग्लादेश युद्ध में भारत और पाकिस्तानी सेनाओं की फायरिंग के बीच मौत से सामना

राम शरण जोशी | Last Modified - Jun 17, 2018, 11:33 PM IST

दुस्साहस पर विवेक का अंकुश होना आवश्यक है- भास्कर मंडे पॉजटिव
किस्सा 1971 का है। भारत-पाक जंग का मंच तैयार हो रहा था। उन दिनों त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से मैं तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश ) में चल रहे स्वतंत्र बांग्लादेश के आंदोलन की रिपोर्टिंग पर था। बंगालियों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना का दमन जारी था। प्रतिरोध में थी ‘ बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी’। पश्चिमी पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के कारण लाखों बंगाली शरणार्थी सीमावर्ती राज्यों में पहुंच रहे थे, जिनमें से एक राज्य त्रिपुरा भी था, जहां अनेक शरणार्थी शिविर ‘स्थापित किया गए थे। दूसरी तरफ मोर्चे पर भारत-पाकिस्तान की सेनाएं एक-दूसरे के सामने तैनात थीं। यह सीमावर्ती नगर एक प्रकार से सुरक्षा शिविर में तब्दील था। चप्पे-चप्पे पर पुलिस, सेना व गुप्तचर एजेंसी के लोग। अखओड़ा बॉर्डर लगा हुआ था। आमबात थी गोलाबारी और उसमें मौतें..इन तमाम गतिविधियों को कवर करके मैं समाचार एजेंसी ‘समाचार भारती’ को भेजा करता था। एक रोज़ सूचना मिली कि प्रधानमंत्री इंदिरा गाँंधी शरणार्थी शिविरों की यात्रा करने वाली हैं। कस्बानुमा राजधानी अगरतला में देशभर से जमा पत्रकारों में हलचल होने लगी। ख़बरों में गर्मी आ गई। घोषित तिथि पर इंदिराजी पहुंच गईं। सबसे पहले उन्होंने सर्किट हाउस में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसके बाद सीमाओं पर स्थित शिविरों के दौरे का कार्यक्रम बना लेकिन, सुरक्षा अधिकारियों ने सुरक्षा की दिक्कतें बताईं, क्योंकि कुछ किलोमीटर का फासला ऐसा था, जो सीमा से बिल्कुल सटा था। पाकिस्तानी फौजी तैनात थे। कोई भी अनहोनी घट सकती थी। दिन भी ढलने वाला था। लेकिन इंदिराजी ने किसी दलील नहीं सुनी। सिर्फ अंग्रेजी में इतना ही कहा, ‘मुझे अपने लोगों से मिलना है’। इतना कहकर वे फौरन अपनी कार में जा बैठीं और ड्राइवर को स्टार्ट करने का आदेश दिया। उनके संकल्प को देखकर उनके साथ आई पश्चिम बंगाल की राज्यपाल पद्‌मजा नायडू को भी अपनी भारी भरकम देह के साथ कार की तरफ बढ़ना पड़ा। इसके बाद हम सभी कार-काफिले में जा जमे।
पाकिस्तानी सैनिकों की संगीनों को चीरते हुए इंदिराजी आगे बढ़ती रहीं। साथ में हम सब भी। प्रधानमंत्री जिस रास्ते से गईं। शिविरों की यात्रा के बाद उसी रास्ते से वापस लौटीं भीं। किसी अनहोनी का भय उनके अडिग आत्मविश्वास व फौलादी संकल्प को तोड़ नहीं सका।
बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध से जुड़ी एक निजी घटना है। दिसंबर 1971 शुरू हो चूका था। मोर्चों पर भारत-पाकिस्तान युद्ध जारी था। मैं इस समय त्रिपुरा से लौटकर पश्चिम बंगाल के मोर्चे को कवर कर रहा था। कोलकाता से जैसोर-खुलना क्षेत्र की लड़ाई की रिपोर्टिंग के लिए प्रेस पार्टी जाया करती थीं। एक रोज़ युद्ध क्षेत्र के अति संवेदनशील व खतरनाक इलाके में मैं और एक-दो विदेशी पत्रकार अति उत्साह में प्रवेश कर गए; सामने पाकिस्तानी सेनाएं थीं। चंद मिनटों में फायरिंग शुरू हो गई। पीछे से भारतीय सेना ने भी ज़वाबी कार्रवाई शुरू कर दी। हम लोग भारत-पाक क्रॉस फायरिंग में फंस गए। मौत ने अपनी बाहें फैला रखी थीं। किसी भी क्षण हमारा खात्मा हो सकता था। कुछ पलों के लिए हम चेतना शून्य थे। जीवन-मृत्यु के बीच त्रिशंकु बने हुए थे। इस खतरनाक स्थिति को देखकर एक भारतीय टैंक दनदनाता हुआ हमारी रक्षा में आकर ढाल बन गया। टैंक पर सवार फौजी अफसर ने अपने पीछे-पीछे चलने का आॅर्डर दिया। कुछ सख्त और नाराज़गी भरे स्वरों में। कुछ समय में उसने हम लोगों को सुरक्षित स्थान पर छोड़ दिया। तब तक फायरिंग बंद भी हो गई थी। वहां शेष पत्रकार और अधिकारी बेसब्री से हमारा इंतज़ार कर रहे थे। जब ऐसे नाज़ुक क्षणों में फंसे हों तब आपके धैर्य व विवेक की परीक्षा होती है। दुस्साहस पर विवेक का अंकुश होना चाहिए।
वैसे पत्रकारिता से जीवन यात्रा में काफी कुछ सीखा है। दो घटनाओं का ज़िक्र यहां मौजूं रहेगा। आठवें दशक के शुरू में मुरादाबाद में ज़बरदस्त सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। कई लोगों की जाने गईं। नगर में कर्फ्यू लगा दिया गया। दंगों की रिपोर्टिंग के लिए मैं दिल्ली से मुरादाबाद गया। पहली रात को ही एक स्थानीय पत्रकार के सहयोग से मैंने मस्जिद में ही डेरा जमाया। चुनिन्दा मुस्लिम प्रतिनिधियों से काफी उत्तेजक, असुविधाजनक तीखे सवाल किए.. पाकिस्तान के साथ हमदर्दी क्यों? जब पाकिस्तानी टीम हॉकी या क्रिकेट मैच जीतती है तो यहां के मुस्लिम क्यों तालियां बजाते हैं? मेरी बेबाकी पर वे खुश भी थे,और कुछ नाराज़ भी। मैंने हिम्मत नहीं हारी और शांतिपूर्वक उनके जबाब नोट करता रहा। मेरे साथ कुछ भी घट सकता था। इन क्षणों में पत्रकार की निष्पक्षता-तटस्थता कारगर बड़ी काम देती है।
खालिस्तान आंदोलन के सूत्रधार जरनैल सिंह भिंडरावाले का इंटरव्यू जितना दिलचस्प रहा उतना ही खतरों से भरा था। जून, 1984 के ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार से चंद रोज़ पहले ही मैंने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के नानक निवास में भिंडरावाला का इंटरव्यू लिया था। करीब एक घंटे की इस भेंट वार्ता में वह भड़का, उसका चेला बनने के लिए कहा, गरीबी-अमीरी और ईश्वर के सवाल पर गुस्सा फूटा भी। उसके हथियारबंद खाड़कूओं की मुठियां भी तन गई। लेकिन, उसके ही एक शिष्य के हस्तक्षेप से सब शांतिपूर्वक निपट गया। भिंडरावाले ने मुझे बिदा किया। हंसते हुए इतना ज़रूर कहा, ‘तुम्हारा कुलदीप नैयर भी मेरा चेला बन गया है।’ भिंडरावाले पंजाबी बोला करता था। दुभाषिये से काम चलाया। पत्रकारिता दिलचस्प पेशा है लेकिन, इसमें पैनी समझदारी और संवेदनशीलता भी उतनी ही अपेक्षित है। ज़रा सी चूक, अर्थ का अनर्थ कर सकती है और घातक भी सिद्ध हो सकती है।

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