--Advertisement--

हे सरकार! मैं बेटी हूं, बहुत डरी हुई हूं; कोख से लेकर गोद तक कहीं सुरक्षित नहीं...बचा लीजिए

3 साल की बच्ची से दुष्कर्म...फांसी का कानून, पॉक्सो कोर्ट कब?

Danik Bhaskar | Jul 04, 2018, 03:23 AM IST

सरकार! मैं मां के गर्भ से निवेदन कर रही हूं। मां रोजाना सुबह जब अखबार पढ़ती है तो धड़कनें मेरी तेज हो जाती हैं। आप भी पढ़ती होंगी। आप महिला मुख्यमंत्री हैं... क्या आपकी रूह भी सिहर जाती है। हैडलाइंस रिपीट कर रही हूं- दरिंदगी की हद देखिए... डायपर पहनी बच्ची भी सुरक्षित नहीं, 7 साल की बच्ची से रेप-हत्या फिर रेप... खबरें भले अलग हों, लेकिन सवाल एक ही है- गुनहगार कैसे बच जाते हैं, खुले घूमते रहते हैं। जानती हैं- दुष्कर्म से भी कहीं ज्यादा दर्द गुनहगार का खुला घूमना ही देता है। हे सरकार! इन निर्लज-निर्मम अधर्मियों को पुलिस और जज अंकल सींखचों के पीछे क्यों नहीं डाल देते? कारण, शायद आपकी कमजोर कानून-व्यवस्था है।


बेटी बचाओ...आगे बढ़ाओ...ये कहती हैं आप। क्या आप मुझे मेरे सुरक्षित जीवन की गारंटी देंगी, तो मैं जन्मने की सोचूं! यह मैं तब कह पा रही हूं, जब मुझे दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह...मेरी मां की कोख में ही मार दिया जाता है। कोख में पलकर जब बाहरी दुनिया में आती हूं तो देवी कहा जाता है। फिर उस देवी को क्यों कोई पापी दरिंदगी का शिकार बना लेता है। कैसे लोग, कैसा समाज है? मुझे सुरक्षित जीवन की गारंटी आप ही दे सकती हैं...सबको डराने वाले इन वहशी लोगों को डराकर। फांसी की सजा का कानून बनाकर आप चुप तो नहीं बैठ सकते ना! कानून बना है तो दिखना भी चािहए। पुरजोर असर के साथ।
घर-बाहर-सड़क-स्कूल में बेटियों को बचाने की जिम्मेदारी आखिर कौन पूरी करेगा? देखिए, 3 साल में 27 ऐसी बच्चियों से रेप हुआ है, जिनकी उम्र 6 साल से भी कम है। दरिंदों का दुस्साहस तो देखिए, मंगलवार को 3 साल की दीदी को नोच डाला। 28, 29, 30...35...40...सैंकड़ों...हजारों... क्या ये आंकड़ा यूं ही बढ़ता रहेगा?


त्राहिमाम, सरकार, त्राहिमाम! अधर्मी दरिंदे खौफ भुला चुके हैं। इन्हें न पुलिस का डर है, न कानून का। वजह साफ है, सजा का भय नहीं होना। 5 साल में 16,393 दुष्कर्म हुए, मगर सजा महज 15% आरोपियों यानी 2,475 को ही हुई। दुष्कर्म पीड़ितों को धीमे न्याय के खिलाफ सोचना बहुत जरूरी है। सरकार! डर लगता है बाहर आने का सोचकर। मैं बेटी हूं। बचना चाहती हूं। बढ़ना भी चाहती हूं। बेखौफ। आप तय करें, पापी से समाज डरे या समाज से पापी!
एक मां का डर बयां करती दो लाइनों के साथ मैं विराम चाहूंगी
हूं फिक्रमंद आज के हालात देखकर...
मैं बेटी मैं ही मां, इसलिए सहमी हुई हूं मैं

#बेटियों के मन की बात : मेरे साथ गलत हो तो बताऊंगी जरूर, फिर क्या करेंगे आप?

11 साल की शिवांगी हूं। सातवीं में पढ़ती हूं। मैडम ने रॉन्ग टच के बारे में बता रखा है। कहां-किसके साथ रहना-जाना है मम्मी बताती है। पापा न्यूजमैन हैं। वे ऐसी घटनाओं के बारे में बताते रहते हैं। घर-स्कूल-कॉलोनी, हर जगह आजकल गंदे लोगों की ही बातें हो रही हैं। अखबार कम पढ़ती हूं, लेकिन उसमें किसी न किसी बच्ची से दरिंदगी की खबर जरूर होती है। आज फिर तीन साल की छोटी बहन से...? अब? सबको पता है, क्या हुआ, किसने किया। सबकुछ पता चल गया ना। अब क्या करेंगे वो जो कहा करते हैं कि तुम्हारे साथ कुछ भी गलत हो तो बताना जरूर। उस राक्षस अंकल को मां ने ही पहचना, पकड़ा...सजा तो कानून ही देगा। कब?


मैं शैली सिंह आठवीं में पढ़ती हूं। मेरे पापा ने मुझे सिखाया है, शोर मचाना-आंखों में मिर्च डाल देना...लेकिन वो छोटी बहन तो ठीक से बोलना भी नहीं जानती होगी। चिल्लाई तो होगी ही। डर लगता है। गुस्सा ज्यादा आता है। यहां जाना, वहां मत जाना। ...क्यों? मुझ पर और मेरी जैसी और बहनों पर ऐसी बंदिशों के जिम्मेदारों को खत्म करो। मैं तो चाहती हूं कि सैकंडों में फैसला हो। मैं एेश्वर्या शर्मा नवीं कक्षा में पढ़ती हूं। अच्छे बुरे आदमी के बारे में टीचर्स और मम्मी ने बता रखा है। पहचान करना भी सिखा रखा है। मुझे अच्छा नहीं लगता कि मैं कॉलोनी में कहीं खेलने नहीं जा सकती। घर में ही रहती हूं। कोई यह तो बताए, सुरक्षित कहां हूं?

लक्ष्मी प्रसाद पंत की त्वरित टिप्पणी: बच्चों के बलात्कारियों को पहली फांसी कब?

ती न साल की बच्ची से दुष्कर्म...। दरिंदगी की तो यह हद है...। ऐसी घटनाओं से दिमाग की नसें चटकने लगती हैं...। हम सब स्तब्ध और सन्न हैं। ये खबरें हमें डराती हैं और चीख-चीख कर यह कहने पर मजबूर करती हैं, कि अब बस...। यह वहशियाना पागलपन अब बर्दाश्त नहीं होता। लेकिन सवाल यह है कि हमें सुन कौन रहा है। ऐसा करने वाले दरिंदे तो कब के बहरे हो चुके हैं। कानून का डर होता तो क्या ऐसी घिनौनी हरकत कर पाते? और डर होता भी तो कैसे? आज तक प्रदेश या देश में सरकार कोई ऐसा उदाहरण सामने नहीं रख पाई जिसे देखकर यहां-वहां, हर जगह बलात्कारियों की लपलपाती जीभें डर के मारे कांप उठें। इन दरिंदों को पता है कि यह पाप कर भी दिया तो क्या होगा? सजा तो सालों दूर है, यहां तो गिरफ्तारी भी मुश्किल है।


बच्चों के साथ बलात्कार जैसे इस राज्य का ‘राजकीय कर्म’ हो गया है। हर दिन तीन से चार घटनाएं यहां आम हैं। और हम समझदार और संवेदनशील समाज वाले और शासन वाले क्या कर रहे हैं। बस नंबर गिन रहे हैं। सियासत की मानसिकता भी एक सीमित दायरे में ही है। एक ही जवाब- हमने तो कानून बना दिया। फांसी तक जोड़ दी। और क्या करें।... लेकिन हे सरकार! आपके कानून के हाथ इन बच्चों को महफूज नहीं कर पा रहे क्योंकि उनका दर्द कानून की चौखट तक पहुंच ही नहीं पा रहा है। यहां चौखट का मतलब पॉक्सो अदालतें हैं। फांसी देने के लिए कोर्ट चाहिए। अफसोस 33 जिले और केवल एक पॉक्सो कोर्ट। क्या यही है न्याय?


अब हम तक आने वाली खबरों का हिसाब। मासूम बच्चों के चबाए हुए होंठ, सूजी हुई आंखें और रौंदे हुए शरीर की खबरें जब जब हम तक पहुंचती हैं तो एकबारगी तो दिमाग कांपने लगता है। कांपते हाथों को यह समझाना मुश्किल होता है कि खबर को कहां से एडिट करें और क्या हैडलाइन लगाएं। तस्वीरें देखकर एक अजीब तिलमिलाहट होती है। पीड़ा के इन क्षणों में एक डर हमारे भीतर भी उतरता है। जाहिर है कि हिंसक, बर्बर और विकृत दिमागों वालों का यह अंधा पागलपन हम सबको बेचैन करता है। ये भयावह खबरें फंुफकारती हैं।


हे सरकार! दुनिया के कई देशों में संक्रामक बीमारी फैल जाने पर पूरी की पूरी नस्लें खत्म करने का भी प्रचलन है। इसलिए कोई ऐसी नजीर आप भी पेश कीजिए जिससे किसी भी बलात्कारी में मन में उपज रही कुत्सित भावना उस डर के खौफ से खुद ही कुचली जा सके। क्योंकि यहां हमारे मासूमों के दुश्मन बहुत दूर नहीं बल्कि उनके पड़ोस, गली, पार्क और बहुत आसपास ही बैठे वे खतरनाक मुखौटे हैं जो लगातार उन्हें घूर रहे हैं। ये पहले नन्हे मासूमों को दुलारते हैं और फिर मौका मिलते ही अपनी दरिंदगी की सारी सीमाएं लांघ जाते हैं। चारों तरफ ये गंदगी फैली हुई है।


और अंत में। बच्चों के बलात्कारियों के प्रति जनाक्रोश बढ़ता देख यही लग रहा है कि किसी दिन समाज कानून अपने हाथ में न ले ले। भावनाओं का यह विस्फोट बेहद घातक होगा। इसलिए बच्चों के साथ हो रहे इस ‘यौन उपद्रव’ का दमन जल्दी कीजिए। बच्चों से बलात्कार पर पहली फांसी का सबको इंतजार है।