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टेक्नोलॉजी के युग में नैतिक धार वाली शिक्षा और भी जरूरी

करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच

नरपत दान चारण | Last Modified - May 02, 2018, 01:56 AM IST

टेक्नोलॉजी के युग में नैतिक धार वाली शिक्षा और भी जरूरी

अध्यादेश के जरिये कड़ा कानून लाए जाने के बाद भी देश में दुराचार की घिनौनी घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। दरअसल, यह इस बात का लक्षण है कि हमारा समाज संस्कारों और नैतिक गुणों से विहीन होता जा रहा है। आए दिन देश में दुराचार, हत्या, शोषण के समाचार पढ़ते-सुनते हैं और सोचते हैं कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। तब और दुख होता है, जब शिक्षित लोग भी ऐसे अपराधों में लिप्त पाए जाते हैं। सवाल उठता है कि सख्त कानून के बावजूद आखिर भय क्यों नहीं है? क्योंकि शिक्षित लोग भी एेसे अपराध कर रहे हैं? क्योंकि सवाल भय का नहीं, नैतिकता का है, जो लगभग खत्म है।


हमारे धर्म ग्रंथों में भी लिखा है कि नैतिक पतन समाज को मानवीय मूल्यों से खोखला कर देता है। नैतिकता उचित शिक्षा से ही आती है। शिक्षा ही समाज का प्रेरक बल है और शिक्षक उसकी प्रेरणा। इसलिए इस नैतिक पतन के लिए कहीं न कहीं हमारी शिक्षा पद्धति जिम्मेदार है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में भौतिकता की अधिकता है। जहां हमारी शिक्षा का दर्शन नैतिक और मानवीय होना चाहिए वहीं दुर्भाग्यवश हमारी शिक्षा प्रणाली में व्यावसायिकता हावी है।

यह एक सीमा तक सही है कि हम रोजगारपरक शिक्षा से डॉक्टर, इंजीनियर,वैज्ञानिक,उद्यमी तैयार कर रहे हैं मगर बदलते परिवेश में जरूरत है ऐसी शिक्षा की जो पूर्णतया शोषणमुक्त और न्यायसंगत समाज का निर्माण करने में सहायक हो। हमें ऐसा समाज बनाना होगा, जिसमें भौतिकता के साथ नैतिकता, व्यावहारिकता और मानवीय गुणों का समन्वय हो। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी समाज तब तक समृद्ध नहीं हो सकता जब तक वहां दी जाने वाली शिक्षा सामाजिक, लौकिक, व्यावहारिक और नैतिक न हो। संस्कारों और नैतिक मूल्यों के द्वारा सभ्य समाज की स्थापना करना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।


टेक्नोलॉजी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उभरते युग में नैतिकता की जरूरत पहले से कहीं अधिक है, क्योंकि तभी हम लाभ के लोभ से मुक्त होकर टेक्नोलॉजी का उपयोग वृहत्तर मानव कल्याण की दिशा में करने को प्रेरित होंगे।

नरपत दान चारण, 29
वरिष्ठ शिक्षक, बाड़मेर,राजस्थान
charannd03@gmail.com

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