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डाउनलोड करेंमनीष शांडिल्य
बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
बिहार में एक कहावत है कि बूढ़ा तोता पोस नहीं मानता है. यानी, उम्रदराज़ व्यक्ति दूसरों के समझाने से भी नहीं मानते हैं.
दिलचस्प यह कि कुछ दिनों पहले बिहार के मुख्यमंत्री ने ख़ुद को एक ऐसा ही बूढ़ा तोता कहा था.
यह कुछ दिनों पहले उस दौर की बात है जब जनता दल यूनाइटेड यानी जदयू के प्रवक्ता, मांझी को सरकार के मंत्री से लेकर उनकी पार्टी के अध्यक्ष तक सोच-समझ कर बोलने और काम करने की नसीहत दे रहे थे.
लेकिन मांझी अपने ही मन-मिज़ाज से चलने वाले साबित हुए. जानकारों का मानना है कि कभी अपनी सादा दिली तो कभी रणनीति के कारण वे बेबाक अपनी राय ज़ाहिर करते रहे.
यहां तक कि शुक्रवार को जब पटना में उनको हटाने की रणनीति तैयार की जा रही थी. तब जहानाबाद में एक सभा में वे कह रहे थे कि उन्हें दब कर काम करना पड़ रहा है.
ग़ौरतलब है कि मांझी अब तक के नौ महीनों के अपने छोटे से कार्यकाल में ख़ासकर अपने बयानों और कुछ फ़ैसलों और गतिविधियों के कारण लगातार ख़ुद अपनी ही पार्टी, ख़ासकर नीतीश कुमार खेमे के निशाने पर रहे हैं.
अब तो जदयू ने उनको विधायक दल के नेता पद से हटाने का फ़ैसला कर लिया है.
राजनीतिक गलियारे में इस बात को लेकर एक राय दिखाई देती है ऐसा नीतीश कुमार के दवाब में किया गया है.
ऐसे में पढ़िए मांझी के लगभग नौ माह के कार्यकाल के ऐसे नौ बयान जिनके बारे में कहा जाता है कि इन बयानों ने नीतीश कुमार को राजनीतिक रुप से सबसे ज़्यादा परेशान किया, नुक़सान पहुंचाया.
1. पिछले साल अगस्त में एक सरकारी कार्यक्रम में मांझी ने कहा था कि बिजली बिल कम करवाने के लिए उन्होंने पांच हजार रुपए घूस में दिए थे. मुख्यमंत्री के इस बयान से पूर्ववर्ती नीतीश सरकार की इस छवि को धक्का लगा कि उनके कार्यकाल में भ्रष्टाचार घटा था.
2. पिछले साल नवंबर में जब जदयू के चार बाग़ी विधायको की सदस्यता बिहार विधानसभा अध्यक्ष ने रद्द कर दी थी तो मांझी ने कहा था कि मैं इस फैसले के पक्ष में नही था. दूसरी ओर जब इस साल जनवरी में पटना हाइकोर्ट ने बर्ख़ास्त विधायकों की सदस्यता बहाल कर दी तो उन्होंने इस फ़ैसले का स्वागत किया. दरअसल ऐसा माना जाता रहा है कि विधानसभा अध्यक्ष से जदयू द्वारा अपने ही विधायकों के ख़िलाफ़ इतनी कठोर कार्रवाई नीतीश कुमार के दवाब में ही की गई थी. इस मामले पर मांझी के रुख़ को नीतीश कुमार के विरोध के रुप में देखा गया.
3. नवंबर में ही मांझी ने कहा था कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार को ‘विशेष राज्य का दर्जा’ दे दें तो वह उनके समर्थक बन जाएंगे. मांझी ने यह बातें बाढ़ में एनटीपीसी के सुपर थर्मल प्लांट के उद्घाटन भाषण के दौरान कही थीं. ग़ौरतलब है कि इस थर्मल पावर की सौग़ात बिहार को नीतीश कुमार के केंद्रीय मंत्री रहते मिली थी लेकिन एनटीपीसी के इस कार्यक्रम में उन्हें नहीं बुलाया गया था. एक केंद्रीय संस्थान द्वारा नीतीश कुमार को नहीं बुलाना और फिर उसी कार्यक्रम में केंद्रीय सरकार के मुखिया और नीतीश के घोर राजनीतिक विरोधी के प्रति मांझी द्वारा समर्थन जताना नीतीश खेमे को बहुत नागवार गुज़रा था.
4. ग्यारह नवंबर को मांझी ने बेतिया में कहा था कि सवर्ण जातियों के लोग विदेशी हैं. तब उनकी पार्टी ने ही इस बयान से किनारा कर लिया था. माना जाता है कि नीतीश कुमार इस बयान से इस कारण नाराज़ हुए क्योंकि वह सवर्ण तबके का एक बार फिर से समर्थन हासिल करने की कोशिशों में लगे हैं.
5. मांझी जनवरी में लालू प्रसाद यादव के साले साधु यादव के यहां चूड़ा-दही भोज में शामिल हुए थे. तब नीतीश खेमे ने तल्ख़ टिप्पणी करते हुए इसे सुशासन के उस कार्यक्रम के ख़िलाफ़ बताया था जिसे बड़ी मेहनत से नीतीश ने बिहार में स्थापित किया था.
6. जनवरी में ही मांझी ने एससी-एसटी अधिकारियों के साथ गुप्त बैठक की थी. बाद में जब इसकी आलोचना हुई तो उन्होंने प्रेस-कांफ्रेंस में साफ़-साफ़ कहा कि वे ऐसी बैठकें कर नीतीश कुमार के ही रास्ते पर चल रहे हैं.
7. हाल में ही मांझी ने यह दावा किया था कि उनके कार्यकाल में नीतीश सरकार के मुक़ाबले बजट का ज़्यादा बेहतर इस्तेमाल हुआ है. मांझी के इस दावे को प्रशासनिक रुप से नीतीश कुमार से बड़ी लकीर खींचने के दावे के रुप में लिया गया.
8. कुछ ही दिनों पहले मांझी ने यह इशारा किया कि कुछ प्रावधानों के आधार पर दलितों की पासवान जाति को भी महादलित का दर्जा दिया जाएगा. मांझी के इस पहल को नीतीश कुमार के फ़ैसले को बदलने के तौर पर प्रस्तुत किया गया.
9. जानकारों के मुताबिक़ नीतीश कुमार और उनके खेमे को जो सबसे ज़्यादा नागवार गुज़रा वह मांझी का बार-बार यह कहना कि वे चाहते हैं कि सूबे का अगला मुख्यमंत्री कोई दलित ही बने.
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