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बिलासपुर हाईकोर्ट ने संसदीय सचिवों के खिलाफ दायर की गईं याचिकाएं खारिज की

3 वर्ष पहले
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बिलासपुर.  संसदीय सचिवों की नियुक्ति को चुनौती देते हुए लगाई गई लगाई गई एक जनहित याचिका, दो याचिकाएं व एक अवमानना याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। शुक्रवार को दिए गए फैसले में हाईकोर्ट ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 163-164 में दी गई मंत्री की परिभाषा के तहत संसदीय सचिव किसी संवैधानिक या वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर रहे। उन्हें किए गए भुगतानों से यह साबित नहीं होता कि उनके पास लाभ का पद यानी ऑफिस ऑफ प्रॉफिट है। इसे साबित करने के लिए याचिकाकर्ता कोई रिकॉर्ड या दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं कर सके हैं। वहीं, अगस्त 2017 में दिए गए आदेश को यथावत रखा गया है, इस आदेश के मुताबिक संसदीय सचिव मंत्री के तौर पर कार्य नहीं कर सकेंगे। 

 

संसदीय सचिवों की नियुक्ति को चुनौती देते कांग्रेस के मो. अकबर ने दो याचिकाएं और रायपुर के राकेश चौबे ने जनहित याचिका लगाई थी। 1अगस्त 2017 को हाईकोर्ट ने संसदीय सचिवों के मंत्री के तौर पर कार्य करने पर रोक लगा दी थी, लेकिन इसके बाद भी उन्हें सभी सुविधाएं देने का आरोप लगाते हुए राकेश चौबे ने अवमानना याचिका लगाई थी। सभी पर एक साथ सुनवाई हो रही है। 16 मार्च को सभी पक्षों की बहस पूरी होने के बाद हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था। शुक्रवार को चीफ जस्टिस टीबी राधाकृष्णन और जस्टिस शरद कुमार गुप्ता की बेंच ने सभी याचिकाएं खारिज कर दी। राज्य शासन की तरफ से महाधिवक्ता जेके गिल्डा और शासकीय अधिवक्ता प्रसून भादुरी ने पैरवी की।  

 

याचिकाओं में दिए थे यह तर्क 
याचिकाओं में कहा गया था कि अधिसूचना जारी कर संसदीय सचिवों की नियुक्ति करना और उन्हें कैबिनेट मंत्री के साथ संबद्ध करना पूरी तरह असंवैधानिक है। संसदीय सचिव का पद सृजित करने का अधिकार राज्य सरकार या राज्यपाल को नहीं है, ऐसा कर राज्य सरकार ने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। इसी तरह मो. अकबर की याचिका में छत्तीसगढ़ विधान मंडल सदस्य निर्हता निवारण अधिनियम 1967 को चुनौती देते हुए कहा गया था कि इस अधिनियम के तहत संसदीय सचिव पद सृजित करने की शक्ति नहीं है। राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करते हुए संसदीय सचिव पद का सृजन किया गया है।  

 

सरकार व संसदीय सचिवों ने जवाब में ये कहा 
सरकार और संसदीय सचिवों की तरफ से प्रस्तुत जवाब में कहा गया कि संसदीय सचिव पद की अवधारणा लोकतंत्र के स्वीकृत मानदंडों के मुताबिक बेहतर तरीके से प्रशासन और प्रबंधन है। लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकार में मंत्री बनाए गए विधायकों के साथ संसदीय सचिवों को संबद्ध करने का उद्देश्य बेहतर प्रशासन और प्रबंधन है। संसदीय सचिव संबद्ध रहने से मंत्री जनता के प्रति अपने सामूहिक जिम्मेदारी का बेहतर तरीके से निर्वहन कर सकेंगे।  

 

साबित नहीं कर सके संसदीय सचिवों के पास लाभ का पद 
छत्तीसगढ़ मंत्री (वेतन तथा भत्ता) अधिनियम 1972 के तहत मंत्रियों को वेतन और भत्ते दिए जाते हैं। याचिकाओं में इस अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती ही नहीं दी गई थी। बावजूद इसके हाईकोर्ट ने अधिनियम के तहत किए गए भुगतानों पर विचार किया। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा शिवमूर्ति स्वामी इनामदार और अनमोल सिंह के मामलों में दिए गए फैसलों का हवाला देते हुए कहा है कि इस  अधिनियम के तहत किए गए भुगतानों की रसीदों से यह साबित नहीं होता कि संबंधित लाभ का पद रखता है। याचिकाकर्ता कोई दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं कर सके हैं, जिससे साबित होता हो कि वे लाभ का पद होल्ड करते हैं। 

 

हाईकोर्ट ने 1 अगस्त को दिया था यह आदेश 
हाईकोर्ट ने 1 अगस्त 2017 को दिए गए अंतरिम आदेश में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बी राय विरुद्ध आसाम राज्य के मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि संविधान में मंत्री परिषद का प्रावधान है। मुख्यमंत्री इसके प्रमुख होंगे, जिनकी नियुक्ति राज्यपाल करेंगे। मुख्यमंत्री की अनुशंसा पर राज्यपाल ही मंत्रियों की नियुक्ति करेंगे। संविधान में 91वें संशोधन के द्वारा प्रावधान निर्धारित किया गया है कि राज्य की विधानसभा के सदस्यों से 15 फीसदी ही मंत्री परिषद में शामिल किए जा सकेंगे, इसमें मुख्यमंत्री भी शामिल हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि इसका अभिप्राय है कि मुख्यमंत्री की अनुशंसा पर राज्यपाल द्वारा नियुक्त मंत्री परिषद के सदस्य होंगे। इस नियम के विरुद्ध नियुक्त कोई भी व्यक्ति मंत्री के रूप में कार्य नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने प्रदेश के सभी संसदीय सचिवों के मंत्री के रूप में कार्य करने पर रोक लगा दी थी। शुक्रवार को दिए गए फैसले में भी इस आदेश को यथावत रखा गया है।  

 

ये हैं संसदीय सचिव 
वर्तमान में अंबेश जांगड़े, लाभचंद बाफना, लखन देवांगन, मोतीराम चन्द्रवंशी, रूपकुमारी चौधरी, शिवशंकर पैकरा, सुनीति सत्यानंद राठिया, तोखन साहू, चंपा देवी पावले, गोवर्धन सिंह मांझी और राजू सिंह क्षत्री को संसदीय सचिव हैं।

 

हमारी उम्मीदों के अनुरूप ही फैसला आया है,निर्णय का सम्मान : रमन
बिलासपुर हाईकोर्ट ने संसदीय सचिवों पर आए निर्णय पर मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा कि ये तो होना ही था। पहले ही साफ किया जा चुका था कि संसदीय सचिवों के मामले में कोई गलत काम नहीं हुआ है। हम हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं।  मुख्यमंत्री ने कांग्रेस नेताओं पर भी निशाना साधा कि उनका काम  है इधर उधर घूमना। हमें पता था फैसला न्याय के पक्ष में ही आएगा। हाईकोर्ट ने संसदीय सचिव मामले पर बहुप्रतीक्षित फैसला देते हुए शुक्रवार को  रिट पिटीशन ख़ारिज कर दी। हालांकि कोर्ट ने यह कहा है कि अंतरिम आदेश स्थाई रुप से जारी रहेगा। अंतरिम आदेश में कोर्ट ने कहा था कि संसदीय सचिवों को मंत्रियों वाले कोई अधिकार अथवा सुविधाएं नहीं मिलेगी। भाजपा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक ने हाईकोर्ट के फैसले पर कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए कि दूध का दूध और पानी का पानी हो गया है।उन्होंने कांग्रेस को नकारात्मक राजनीति छोड़ सकारात्मक राजनीति करने की नसीहत भी दी है। 

 

याचिका खारिज नहीं हुई- कांग्रेस 
कांग्रेस नेता मोहम्मद अकबर ने इस  मामले भाजपा नेताओं की समझ पर  प्रश्न उठाते हुए कहा कि मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह और बीजेपी के अध्यक्ष धरमलाल कौशिक को न्यायालयीन मामलों की समझ नहीं है, इसलिए संसदीय सचिवों के मामले में हुए फैसले को वे समझ बैठे कि याचिकाएं खारिज  हो गई हैं जबकि याचिकाएं खारिज न होकर निराकृत हुई हैं। जिसमें न्यायालय ने अपने पूर्व के आदेश को यथावत रखते हुए आगे संसदीय सचिवों को मंत्री के तौर पर काम करने से रोक लगा रखी है। अकबर ने पूछा है कि संसदीय सचिवों पर जो 34 करोड़ की राशि हुई खर्च हुई है उसके लिए जिम्मेदार कौन है, किससे वसूला जाए, ये भी रमन सिंह को बताना चाहिए। उन्होंने बताया कि वरिष्ठ नेताओं से सलाह लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी करेंगे। फैसले पर पीसीसी चीफ भूपेश बघेल ने कहा सरकार अवैधानिक है।सरकार ने  संविधान के विपरीत 11 संसदीय सचिवों की नियुक्ति की है। उन्हें मंत्री की तरह सुविधा दे रही है। उन्होंने कहा कि 13 मंत्रियों के अलावा गैरकानूनी रूप से सरकार ने 11 अतिरिक्त मंत्री रखे हैं,अगर इनकी नियुक्ति रद्द होती तो सरकार गिर जाती।

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