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डाउनलोड करेंभारतीय जनता पार्टी को दिल्ली विधानसभा चुनाव में पहले जीत का दावेदार माना जा रहा था.
एग्ज़िट पोल में उसे आम आदमी पार्टी से पिछड़ता दिखाया गया लेकिन मतगणना रुझानों में पार्टी का प्रदर्शन अनुमान से काफ़ी कम रहा.
भारतीय जनता पार्टी सिर्फ तीन सीटों तक सिमट कर रह गई है जबकि कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली.
राजनीतिक पंडित मानते हैं कि इसके लिए पार्टी की अपनी रणनीति काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार रही. एक नज़र उन फ़ैसलों-क़दमों पर, जो चुनाव में नुक़सान पहुंचाने वाले रहे.
1. दिल्ली चुनाव प्रचार की कमान एक तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने संभाली और शुरुआती दौर में चुनाव को मोदी को सामने रखकर लड़ने का फ़ैसला लिया गया.
2. बाद में भाजपा ने किरण बेदी को पार्टी में लाकर महज़ चार दिन के अंदर मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया. इससे पार्टी के राज्य स्तरीय नेता अंदर ही अंदर नाराज़ हो गए.
3. इस दौरान कई सीटों पर बाहरी उम्मीदवारों को टिकट दिए गए, जो पार्टी के लिए फ़ायदेमंद नहीं रहा.
4. किरण बेदी और अन्य उम्मीदवारों के समर्थन के लिए नरेंद्र मोदी ने अपनी पूरी कैबिनेट को चुनाव प्रचार में लगा दिया.
5. कैबिनेट मंत्रियों को अलग-अलग विधानसभा सीटों की ज़िम्मेदारी दी गई. दूसरे राज्यों से भी संघ कार्यकर्ता दिल्ली में लगाए गए, पर दिल्ली के स्थानीय कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता गया.
6. नरेंद्र मोदी सहित भाजपा के कई नेताओं ने अरविंद केजरीवाल पर व्यक्तिगत आरोप लगाए.
7. केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमले आपत्तिजनक कार्टूनों के ज़रिए भी हुए. एक कार्टून में केजरीवाल को उपद्रवी गोत्र का बताया गया. इससे भी पार्टी से ख़ास समुदाय का मोहभंग हुआ.
8. समाचार पत्रों में भाजपा की ओर से विज्ञापनों की बरसात का मतदाताओं पर सकारात्मक असर नहीं पड़ा.
9. चुनाव से चार दिन पहले आम आदमी पार्टी की फ़ंडिंग पर सवाल उठाए गए. वित्त मंत्री अरुण जेटली तक ने कहा कि केजरीवाल हवाला का चंदा लेते हैं.
10. चुनाव से एक दिन पहले जामा मस्जिद के शाही इमाम बुख़ारी ने मुसलमानों से आम आदमी पार्टी को वोट देने का फ़तवा जारी किया. भाजपा ने इसके बाद आम आदमी पार्टी को सांप्रदायिक रंग में रंगी पार्टी करार दिया.
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