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सातवीं में स्कूल ड्रॉपआउट, फुटपाथ पर बेचीं किताबें और अब बने लोकप्रिय किताब के लेखक

विचार किसी स्कूल की जागीर नहीं हैं। जीवन ही आपको विचारवान बनाता है और एक निष्कर्ष तक पहुंचाता है

Dainik Bhaskar

Jul 29, 2018, 11:21 PM IST
चर्चित पुस्तक ‘कर्मायण’ के ले चर्चित पुस्तक ‘कर्मायण’ के ले

चर्चित पुस्तक ‘कर्मायण’ के लेखक और युवा प्रकाशक संतोष पांडेय के मुताबिक, मेरा जन्म जौनपुर के बरसठी ब्लॉक के पांडेपुर अमानी गांव में हुआ था। पहली बार दुख से तब परिचय हुआ, जब मैं छठी का छात्र था। 1992-93 की सर्दियों में बहन की शादी होने वाली थी। सिर्फ तीन दिन बचे थे। बारिश में कच्चा मकान गिर गया था, केवल एक कमरा बचा था। मेहमानों को कहां ठहराया जाएगा। ख़ैर,जमीन का एक टुकड़ा था, जिसे बेचकर बहन की शादी हुई और हम सब किसी तरह जीवन गुजारने लगे।


सातवीं में था तब एक दिन मैं स्कूल से घर लौटा तो देखा मौसेरे भाई बंबई से आए हैं। वे वहां किताबों का कारोबार करते थे। उन्हें एक सहयोगी की ज़रूरत थी। भैया चाहते थे कि मैं वहां जाकर काम करूं। मौसेरे भाई ने ही जाने का सारा इंतजाम किया। मंुबई में मौसेरे भाई के घर के पास एक मैकेनिकल इंजीनियर रहते थे। वे वकोला के पास शिवाजी नगर में टर्नर का काम करते थे। मैंने उनसे काम के बारे में पूछा। अगले दिन उन्होंने बताया कि 20 रुपए रोज पर एक हेल्पर की ज़रूरत है। वहां पानी के जहाज में इस्तेमाल लाई जाने वाली बैट्रीज बनती थीं, जिनका वज़न 40-50 किलो होता था और तब मेरे पूरे शरीर का वज़न 35 किलो रहा होगा। पर क्या करता। ये काम करते हुए एक महीने बीत गया। मेरी हथेलियों पर छाले पड़ गए थे। एक दिन भैया ने यह देखा तो यह काम करने से मना कर दिया। मैं घर पर रुका तो मैंने देखा कि उनके घर बकाएदारों की भीड़ लगी है। मेरी नज़र किताबों के बंडल पर पड़ी। ये वो किताबें थीं, जो भैया होलसेल में लेकर आते थे और फिर पुरानी किताबें बेचने वालों को थोड़ा-सा मुनाफा लेकर बेच देते थे। भैया काम पर गए थे। मैंनेे बंडल उठाया और वकोला ब्रिज के फुटपाथ पर किताबें फैलाकर बैठ गया। पहले ही दिन भैया ने पकड़ लिया, पूछने लगे- ये क्या सूझा तुम्हें। मैंने बताया कि 70-80 रुपए की किताबें बेची हैं, लेकिन बहुत से लोग तरह-तरह की पुस्तकों के बारे में पूछते हैं। उन्होंने हौसला बढ़ाया कि कोई बात नहीं। तुम तो मांगी गई किताबों के नाम डायरी में नोट कर लिया करो।

मैं अगले दिन ले आया करूंगा। धीरे-धीरे छह महीने में वो व्यवसाय जम गया। भैया का पूरा कर्ज़ उतर गया। मैं सारे पैसे भैया को दे देता था। कुछ दिनों बाद गांव पहुंचा। वहां जाने के कुछ ही दिन में मेरी शादी तय हो गई। मुंबई लौटकर मैंने भैया को बताया तो उन्होंने खुश होकर कहा कि तुम्हें 20-25 हज़ार रुपए तो देने होंगे। हालांकि घर आते वक्त उन्होंने सिर्फ 3200 रुपए दिए। मैं गांव आया, शादी हुई। लौटते हुए मैं यही सोच रहा था कि भैया अपने हालात की वज़ह से मुझे पैसे दे नहीं सकेंगे। मैं जहां काम करता था, वहीं पर जान-पहचान वाले एक शख्स के घर पर रुक गया। चार फीट के कमरे में वे रहते, खाना बनाते, नहाते-धोते थे। ख़ैर, हम साथ ही रहने लगे। मेरे पास सिर्फ 40 रुपए थे। मैंने उनसे 100 रुपए उधार लिए और फिर अगली सुबह मैं कबाड़ियों की दुकान पर पहुंच गया। मैंने रद्दी में आई कुछ किताबें खरीदीं और फिर चर्चगेट के पास 200 रुपए में बेच आया। हफ्ते भर में मैंने साढ़े तीन हज़ार रुपए का बिज़नेस कर लिया था। एक हज़ार रुपए मैंने घर पर भेज दिए।


एक दिन मैं मिठीबाई कॉलेज के सामने से गुज़र रहा था तो महसूस किया कि वहां काफी भीड़ रहती है। थोड़ी मुश्किल के बाद मैंने वहां भी किताबें बेचने के लिए एक छोटे से स्टॉल की शुरुआत कर दी। लेकिन उधर गांव में बचा-खुचा कच्चा मकान भी गिर गया। किसी तरह मैंने पैसे जुटाकर वहां काम शुरू कराया, इधर मुंबई महानगर पालिका ने मेरी दुकान तुड़वा दी। किताबें बेचना मेरे लिए रोजी-रोटी का साधन था, लेकिन उनके पन्नों में लिखे शब्दों को आत्मसात करना फितरत हो गई थी। कमाई का कोई साधन नहीं था, ऐसे में लोन पर लिए गए घर की किश्तें चुकानी तक मुश्किल हो गई थीं। मैं सोचने लगा कि जैसे ही पांव जमने लगे, सब कुछ फिर तहस-नहस हो गया। मेरे मन में ये प्रश्न बार-बार चल रहा था कि जीवन आखिरकार क्या है। इस प्रश्न की तलाश के लिए मैंने कुछ अरसे का ब्रेक लिया और परिवार समेत कुछ दिन के लिए अपने घर चला गया। घर पर मैंने रामचरित मानस, वाल्मीकि रामायण, राधेश्याम रामायणी, नेपाली रामायण, शिव पुराण,गरूड़ पुराण आदि का गंभीरता से अध्ययन किया। अवसाद के पलों में किताबें मेरी सच्ची दोस्त साबित हुईं। खासकर, आध्यात्मिक पुस्तकों ने सकारात्मकता की रोशनी दिखाई- हमारे जीवन में जो कुछ भी होता है,वह संचित कर्मों का परिणाम है।


पढ़ते वक्त मेरे मन में अक्सर विचार कौंधता कि रामकथा में रावण को क्यों खल-चरित्र के रूप में देखा जाता है। क्या रावण तिरस्कृत रह गया है। मैंने रावण की बौद्धिकता, संघर्ष और उत्थान से पतन तक की कथा को करीब 1600 पृष्ठों में लिखा। मैं मुंबई वापस लौटा और यहां मेरी मुलाकात विनोद चेरियन से हुई। उन्होंने मेरी पुस्तक के अनुवाद में रुचि तो दिखाई, लेकिन ये भी कहा कि वे ईसाई हैं और हिंदू धर्म के आलोक में रची गई किताब ट्रांसलेट करना शायद उचित नहीं होगा। हालांकि बाद में वे तैयार हुए। लंबी जद्दोज़हद के बाद मुझे प्रकाशक मिला। इसके सब सूत्र धार्मिक ग्रंथों से लिए, लेकिन रावण के हिस्से की कथा के लिए कल्पना को आधार बनाया। ये किताब किस तरह अंग्रेज़ी में अनुवादित हुई, कैसे मुझे हज़ारों लोगों का समर्थन मिला और किस तरह अब तक इसकी नौ हजार से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं, वह अनूठी दास्तान है। लोगों के लिए ये अचरज की बात होगी कि एक स्कूल ड्रॉपआउट किस तरह कर्मायण सरीखी किताब रच सकता है, लेकिन मैं जानता हूं कि विचार किसी स्कूल की जागीर नहीं हैं। जीवन ही आपको विचारवान बनाता है और एक निष्कर्ष तक पहुंचाता है।


(जैसा उन्होंने मुंबई में चण्डीदत्त शुक्ल को बताया)

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