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इन 3 लोगों को देखकर एक राजकुमार कैसे बना संन्यासी, जानिए पूरी कहानी

Dainik Bhaskar

Apr 29, 2018, 05:00 PM IST

बौद्ध मत के अनुसार, महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में नेपाल की तराई में लुंबिनि में हुआ था।

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रिलिजन डेस्क। वैशाख मास की पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन बुद्ध जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 30 अप्रैल, सोमवार को है। गौतम बुद्ध भगवान विष्णु के ही अवतार थे ऐसी मान्यता है, परंतु पुराणों में वर्णित भगवान बुद्धदेव का जन्म गया के समीप कीकट में हुआ बताया गया है और उनके पिता का नाम अजन बताया गया है।

यह प्रसंग पुराण वर्णित बुद्धावतार का ही है। उनके स्वरूप को लेकर भी हिन्दू तथा बौद्ध मतों में कुछ भिन्नता व कटुता है। बौद्ध मत के अनुसार, महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में नेपाल की तराई में लुंबिनि में हुआ था। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। अपने शुरुआती दिनों में रोगी, बूढ़ा और मृत शरीर को देखकर उन्हें वितृष्णा हुई। राजपरिवार में जन्म लेकर भी उन्होंने जीवन की सारी सुविधाओं का त्याग कर सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हेतु बोधगया में कठोर तप किया और बुद्ध कहलाए।
उनके समकालीन शक्तिशाली मगध साम्राज्य के शासक बिम्बीसार तथा अजातशत्रु ने बुद्ध के संघ का अनुसरण किया। बाद में सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को श्रीलंका, जापान, तिब्बत तथा चीन तक फैलाया। ज्ञान प्राप्ति पश्चात भगवान बुद्ध ने राजगीर, वैशाली, लोरिया तथा सारनाथ में अपना जीवन बिताया। उन्होंने सारनाथ में अंतिम उपदेश देकर अपना शरीर त्याग दिया।

ज्ञान हमारे भीतर ही है
भगवान बुद्ध जब अंतिम सांसें गिन रहे थे, तभी उन्हें पास से किसी के रोने की आवाज सुनाई दी। गौतम बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद से पूछा- यह कौन रो रहा है? आनंद ने कहा- भंते, भद्रक आपके अंतिम दर्शन के लिए आया है। बुद्ध ने भद्रक को अपने पास बुला लिया। बुद्ध के पास आते ही भद्रक फूट-फूट कर रोने लगा। उसने कहा- आप नहीं रहेंगे तो हमें ज्ञान का प्रकाश कौन दिखाएगा।
बुद्ध ने भद्रक से कहा- भद्रक, प्रकाश तुम्हारे भीतर है, उसे बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। जो अज्ञानी हैं, वह इसे देवालयों, तीर्थों, कंदराओं या गुफाओं में भटकते हुए खोजने का प्रयत्न करते हैं। वे सभी अंत में निराश होते हैं। इसके विपरीत मन, वाणी और कर्म से एकनिष्ठ होकर जो साधना में निरंतर लगे रहते हैं उनका अंतःकरण स्वयं दीप्त हो उठता है।
इसलिए भद्रक 'अप्प दीपो भव' अर्थात् आप स्वयं दीपक बनो। यही मेरा जीवन-दर्शन है। इसे मैं आजीवन प्रचारित करता रहा। भगवान बुद्ध का यह अंतिम उपदेश सुनकर भद्रक को समझ में आ गया कि अपना दीपक स्वयं बनने के लिए उसे क्या करना होगा। उसने उसी दिन से मन, वाणी, कर्म से एकनिष्ठ होकर साधना करने का मन बना लिया।

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