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बजट से जुड़ी कुछ मज़ेदार बातें

7 वर्ष पहले
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भारत का बजट ब्रिटेन के बजट की परंपरा पर ही काफ़ी समय तक चलता रहा और आज भी वहीं की बहुत चीजों का अनुकरण करता है. ब्रिटिश वित्तमंत्री ह्यूज़ डॉल्टन ने 1947 में एक पत्रकार से बात करते हुए कुछ बातें कहीं, जिन्हें उस पत्रकार ने अपने अख़बार में छाप दिया और बजट में वे बातें सही पाई गईं. वित्तमंत्री पर यह आरोप लगा कि उन्होंने बजट लीक कर दी है. उनसे सीख लेते हुए आज़ाद भारत का पहले बजट पेश करते समय आरके शनमुखम ने पूरी गोपनीयता बरती और किसी को कुछ भनक तक नहीं लगने दिया.

शनमुखम के उत्तराधिकारी सीडी देशमुख बड़े परेशान थे कि पैसे का जुगाड़ करने के लिए वे नया कर कैसे लगाएं. उन्होंने अपने बजट भाषण में कहानी सुनाई कि उन्हें एक ग़रीब किसान ने चिट्ठी लिख कर पांच रुपए देने की पेशकश की है. देशमुख ने लोगों से कहा कि जब ग़रीब हमारी मदद करने को तैयार है तो आप क्यों नहीं. पता नहीं लोगों को यह कैसा लगा.

बजट का भला देश की विदेश नीति से क्या ताल्लुक़? पर कई बार ताल्लुक़ रहा है. 1950 के दशक में रूस से मिलने वाला आर्थिक अनुदान बजट के पैसोें का बड़ा हिस्सा रहा है. इसलिए इसकी छाप बजट पर साफ़ दीखती थी. देश की आर्थिक नीतियों का झुकाव रूस की ओर था, यह कई बार साफ़ साफ़ दीखता भी था. भिलाई इस्पात संयंत्र परियोजना की व्यवस्था 1959 के बजट में थी और यह रूस से मिले पैसों से ही हुआ था.

टीटी कृष्णमचारी ख़ुद उद्योगपति थे, पर वे नया कर लगाने को लेकर काफ़ी उत्साहित रहा करते थे. उन्होंने दो नए करों की ईज़ाद की- संपत्ति कर और खर्च पर लगने वाला कर. उन्होंने लोगों से देशप्रेम दिखाने को कहा और बताया कि किस तरह सब लोग मिल कर ही अर्थव्यवस्था को मज़बूत कर सकते हैं.

मोरारजी देसाई को भी नए कर लगाने में अच्छा लगता था. उन्होंने एक बार संसद में साफ़ लफ़्जों में कह दिया कि वे प्लास्टिक सर्जरी करेंगे और यहां का मांस काट कर वहां लगा देंगे, जिसके लिए सदस्य उन्हें माफ़ करें. वे पहले वित्तमंत्री थे , जिसने बजट का काफ़ी प्रचार प्रसार किया और सरकार की नीतियों का ऐलान करने में इसका इस्तेमाल किया.

पी चिदंबरम ने तो बजट पेश किया ही था, पर ऐसा करने वाले वे पहले चिदंबरम नहीं थे. उनके पहले हुए थे चिदंबरम सुब्रमण्यम. वे पहले वित्तमंत्री थे, जिसने बजट भाषण ख़त्म करते हुए कहा था, \"मैं अब संसद से इस बजट को स्वीकार करने की गुजारिश करता हूं.\" उनके बाद से लगभग सभी वित्तमंत्रियों ने थोड़े बहुत बदलाव के साथ यह कहा है.

बजट भाषण के दौरान हंसी मज़ाक कर वातावरण को हल्का बनाने की शुरूआत मधु दंडवते ने की थी. उन्होंने कहा कि मैं अचार पर उत्पाद कर ख़त्म करता हूं ताकि बजट के लिए मुझे कुछ मसाला मिल जाए. उनकी इस परंपरा को तमाम वित्तमंत्रियों ने आगे बढ़ाया.

मनमोहन सिंह ने अपना पहले बजट पेश करते हुए निजी बातें की थीं. उन्होंने कहा कि मेरा जन्म सूखे इलाके के एक ग़रीब परिवार में हुआ था और मैं सरकारी स्कॉलरशिप के बल पर ही पढ़ पाया. मैं अपना यह कर्ज़ उतारने की कोशिश करूंगा.

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