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स्मार्ट सिटी की गाइडलाइन दरकिनार... रांची में जेल आईजी चला रहे स्मार्ट सिटी कॉर्पोरेशन, अन्य शहरों में भी प्रभारी सीइओ बहाल
मोदी सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट स्मार्ट सिटी को धरातल पर उतारने में ब्यूरोक्रेट्स ही सबसे बड़ी बाधा बन गए हैं। स्मार्ट सिटी को संवारना तो दूर उसकी गाइडलाइन को भी मानने के लिए वे तैयार नहीं है। केन्द्रीय आवासन एवं शहरी विकास मंत्रालय ने स्मार्ट सिटी गाइडलाइन में कहा है कि जिन राज्यों के शहरों को स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में शामिल किया गया है, उन शहरों को एक स्पेशल पर्पज व्हीकल (एसपीवी) बनाना है। इसके अलग सीईओ और मैन पॉवर होंगे जो स्मार्ट सिटी में लिए गए योजनाओं को धरातल पर उतारेंगे। लेकिन देश भर में कुछ शहरों को छोड़ दें तो अधिकतर शहरों में एसपीवी के सीईओ की कुर्सी पर आईएएस अधिकारियों ने कब्जा जमा लिया।
कई शहरों में सीईओ की कुर्सी प्रभार के भरोसे चल रही है, जहां नगर आयुक्त और अपर नगर आयुक्त को ही स्मार्ट सिटी सीईओ का प्रभार दे दिया गया है। रांची तो दो कदम आगे बढ़ गई। यहां स्टेट अर्बन डेवलपमेंट एजेंसी (सूडा) के निदेशक जो जेल आईजी भी हैं, उन्हें स्मार्ट सिटी कॉर्पोरेशन के सीईओ का प्रभार दे दिया गया है। स्थाई सीईओ नहीं होने की वजह से चार वर्षों में स्मार्ट सिटी की एक भी योजना धरातल पर नहीं उतरी। स्मार्ट सिटी कॉर्पोरेशन का काम छिनकर नगर विकास विभाग की एजेंसी जुडको को दे दिया गया है।
रांची स्मार्ट सिटी कॉर्पोरेशन में मात्र छह माह ही रहे हायर के गए सीईओ रहे, विभाग का हस्तक्षेप होने पर दिया इस्तीफा
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में चयनित होने के 2 वर्षों के बाद रांची स्मार्ट सिटी कॉर्पोरेशन में पहली बार सितंबर 2017 में स्थाई सीईओ बहाल किया गया था। निजी कंपनी से यतिन सुमन को सीईओ बनाया गया था, लेकिन मात्र छह माह के कार्यकाल के बाद सुमन ने इस्तीफा दे दिया। क्योंकि विभाग का काफी हस्तक्षेप कार्पोरेशन के कामकाज में होने लगा। इसके बाद से अभी तक स्मार्ट सिटी को स्थाई सीईओ नहीं मिला है। विभाग के ही अधिकारी को स्मार्ट सिटी का अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया। इस वजह से आज तक स्मार्ट सिटी के लिए जमीन तक नहीं मिली है।
स्थाई सीईओ नहीं होने से कई प्रोजेक्ट फंसे
असर...एबीडी प्रोजेक्ट का काम धीमा, बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर का काम भी जुडको को दे दिया
{डीपीआर-टेंडर में ही उलझी स्मार्ट सिटी: स्मार्ट सिटी के लिए 2700 करोड़ रुपए का प्रावधान है। इसमें एडीबी के लिए 1033 व पैन सिटी सॉल्यूशन के लिए 1700 करोड़ हंै। केन्द्र ने अभी तक 294 व राज्य ने 294 करोड़ दिए है। 422 करोड़ खर्च हुए हैं। डीपीआर-टेंडर में योजनाएं उलझी हुई हैं।
{पांच प्रोजेक्ट पर काम भी शुरू नहीं: स्मार्ट सिटी में एडीबी क्षेत्र में 18 और पैन सिटी सॉल्यूशन के तहत पूरे शहर में कुल 16 प्रोजेक्ट पर काम होना है। एडीबी एरिया में अभी तक जल संरक्षण और पर्यावरण से जुड़ी पांच योजनाओं पर काम ही शुरू नहीं हुआ।
{लैंड अलॉटमेंट पॉलिसी बनी, आवंटन नहीं : एडीबी को एजुकेशन हब के रूप में विकसित करना है। यहां 375 एकड़ जमीन का अलॉटमेंट निजी कंपनियों और स्कूल-कॉलेज को करना है। अक्टूबर में अलॉटमेंट पॉलिसी बनी, लेकिन अभी तक जमीन का आवंटन नहीं हुआ।
{रोड-नाली,सीवर का काम छीना: धुर्वा में 656 एकड़ में हो रहे एरिया बेस्ट डेवलपमेंट (एडीबी) के तहत 500 करोड़ की लागत सें रोड,नाली, सीवरेज, फुटपाथ का काम होना है। यह काम स्मार्ट सिटी कॉर्पोरेशन से छीनकर नगर विकास की एजेंसी जुडको को दे दिया गया।
प्रभार के भरोसे स्मार्ट सिटी
{इंदौर- एडिशनल कमिश्नर, म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन
{ पटना- एडिशनल कमिश्नर, म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन
{ रायपुर- म्यूनिसिपल कमिश्नर
{ अहमदाबाद-म्यूनिसिपल कमिश्नर
{ सूरत- म्यूनिसिपल कमिश्नर
{ नागपुर- डिप्टी कमिश्नर, म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन
{ जोधपुर- म्यूनिसिपल कमिश्नर
{ चंडीगढ़- म्यूनिसिपल कमिश्नर
{ उदयपुर-जिला परिषद सीईओ
{ कोटा- प्रधान सचिव, नगर विकास
{ जयपुर- स्थाई सीईओ, आईएएस
धरातल पर नहीं उतरी एक भी योजना: भारत सरकार ने पांच वर्षों में 100 शहरों को स्मार्ट बनाने का लक्ष्य रखा था। लेकिन राज्य सरकार स्तर पर एसपीवी में स्थाई सीईओ नहीं बनाया गया। इस वजह से आज तक एक भी शहर स्मार्ट नहीं बना। मध्यप्रदेश और दिल्ली को छोड़कर किसी भी शहर में 50 फीसदी भी काम नहीं हुआ है। अधिकतर शहरों के पास मात्र एक वर्ष का समय बचा है। रांची में अभी तक मात्र 26 फीसदी (एरिया बेस्ड डेवलपमेंट और पैन सिटी सॉल्यूएशन) काम हुआ है। हालांकि धरातल पर एक भी योजना नहीं उतरी है।