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गांव में अस्पताल खोलो, सरकार से 1 करोड़ रुपए लो

8 वर्ष पहले
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जयपुर. एमबीबीएस करके आने वाले युवाओं समेत ऐसे सभी डॉक्टरों को सरकार एक करोड़ रुपए तक का अनुदान देगी जो गांव में जाकर अपना अस्पताल खोलेंगे। अनुदान के लिए आवेदक डॉक्टर के पास गांव में कम से कम 500 वर्गमीटर जमीन होना आवश्यक होगा। इसके साथ ही कम से कम 1 किलोमीटर के दायरे में कोई भी सामुदायिक अथवा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं होना चाहिए।

चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग इस योजना को लागू करने की तैयारी कर चुका है। इसके लिए विस्तृत गाइड लाइन तैयार की जा रही हैं। गाइड लाइन तैयार होने के बाद निजी अस्पतालों के लिए एमबीबीएस डॉक्टरों से आवेदन मांगे जाएंगे।


चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव दीपक उप्रेती के अनुसार प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में गांव और ढाणी तक बेहतर चिकित्सा सेवाएं पहुंचाने के लिए राज्य सरकार ने यह योजना तैयार की है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसी साल बजट में ग्रामीण इलाकों में निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने के लिए लागत का 50 प्रतिशत अथवा अधिकतम 1 करोड़ रुपए तक का अनुदान उपलब्ध कराए जाने की घोषणा की थी।

जनजाति एवं मरुस्थलीय क्षेत्रों में अनुदान की दर 60 प्रतिशत अथवा अधिकतम 1.20 करोड़ रुपए होगी। इस योजना में इस बात पर भी विचार किया जा रहा है कि अनुदान लेने वाले अस्पताल अथवा संस्था को कम से कम 5 साल तक गांव में सेवाएं देनी होंगी। यह अवधि कम या ज्यादा भी हो सकती है, इस पर अभी अंतिम रूप से कोई फैसला नहीं हुआ है।


प्रत्येक तहसील में होगा एक निजी अस्पताल: प्रत्येक तहसील में कम से कम एक और जनजाति तथा मरुस्थलीय क्षेत्र वाली तहसीलों में दो निजी अस्पताल खोलने की योजना है। इस योजना के तहत तहसील मुख्यालय के लिए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ही आवेदन लिए जाएंगे।
एनजीओ भी ले सकेंगे अनुदान: इस योजना में ऐसे स्वयंसेवी संगठनों को भी अनुदान उपलब्ध कराया जा सकेगा, जिन्हें अस्पताल चलाने का अनुभव हो। परंतु ऐसी संस्थाओं को तभी महत्व दिया जाएगा, जब उस क्षेत्र में कोई भी एमबीबीएस डॉक्टर अपना अस्पताल खोलने को तैयार नहीं हो।


निजी अस्पतालों को अनुदान का फैसला इसलिए: मौजूदा चिकित्सा सेवाओं की गांव और ढाणी तक पहुंच नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र के अस्पतालों में स्टाफ और आवश्यक संसाधनों की कमी है। डॉक्टर, नर्स और कंपाउडर ग्रामीण इलाकों में पोस्टिंग तो ले लेते हैं, लेकिन वहां ठहरते नहीं हैं।

पर्याप्त चिकित्सा सेवा नहीं मिलने से रोगियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। दो साल तक एकमुश्त वेतन और अन्य समस्याओं की वजह से सरकारी सेवा में डॉक्टर कम ही आ रहे हैं। मुख्यमंत्री नि:शुल्क जांच योजना, मुख्यमंत्री नि:शुल्क दवा योजना, जननी-शिशु सुरक्षा योजना और शुभ लक्ष्मी योजना की वजह से सरकारी अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और उप स्वास्थ्य केंद्रों में रोगियों का दबाव बढ़ा है।