मातृभाषा की पुकार
संस्कारों की अपनी एक भाषा होती है
जिसका आधार हमारी मातृभाषा होती है।
जननी है ये मानवीय संस्कारों की
जिसकी एक सरल परिभाषा होती है।
भाषा में समाहित साहित्य में
जीवन के हर पल की खुशबू हाेती है।
संसार को बनाए रखने की
भाषा में ही असीमित शक्ति होती है।
लेकिन आज मातृभाषा बहुत उदास हाेकर
बार-बार यही प्रश्न करती है
क्या मैं आज भी सम्मानित हूं?क्या तुम्हें आज भी मेरी चिंता है?
अगर है तो एक एहसान मुझ पर जरूर करना
ये कभी मत भूलना कि तुम्हारी
वैज्ञानिक उन्नति का आधार कल भी मैं थीऔर आज भी मैं हूं...आैर
आने वाले कल मे भी मैं ही रहूंगी
मेरे बच्चों विज्ञान के इस युग में तुम आ तो गए हाे
मगर मुझे भुलाकर संस्कारों
के आधार को बबार्द मत करना
संस्कारों के आधार को बर्बाद मत करना...!!!
डॉ. तृप्ति माथुर
हिन्दी दिवस पर यह कविता हमें दिल्ली से भास्कर रीडर डॉ. तृप्ति माथुर ने लिखकर भेजी है। हिन्दी दिवस पर आप भी अपने विचार हमारे साथ शेयर करें ।