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पोलो खेलने को आसान नहीं है घोड़ा पालना

7 वर्ष पहले
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(फोटो: हैंडी केप के खिलाड़ी हमजा अली।)
जोधपुर। पोलो खेलने के लिए घोड़ा चाहिए और घोड़ा पालना हरेक के बस में नहीं। तीन साल के एक घोड़े को पोलो खेलने के लिए तैयार होने में कम से कम दो साल चाहिए। इस दौरान उस पर कई तरह के खर्चे होतो हैं सो अलग।
एक घोड़े पर ही कम से कम पांच-सात लाख रुपए खर्च आता है। साथ ही एक पोलो मैच खेलने के लिए महज एक घोड़े से काम नहीं चल सकता। कम से कम तीन घोड़े तो चाहिए ही। साथ ही सरकार की तरफ से इस खेल के लिए किसी तरह की सुविधा नहीं। विदेश से घोड़ा मंगाना है तो टैक्स भरो और पोलो की गेंद से लेकर इसे मारने के लिए स्टिक पर भी टैक्स।
हर माह घोड़ों का परीक्षण कराना अनिवार्य। ऐसे में जिसकी अंटी में दम हो वही आदमी पोलो खेलने का ख्वाब पाल सकता है। साथ ही प्रायोजक भी गिने चुने और उनसे भी मिलता है नाम मात्र का पैसा।
यही कारण है कि बरसों पुराना खेल होने के बावजूद इस खेल को इतनी प्रसिद्धि नहीं मिल पाई जिसका वह हकदार है। यह कहना है देश-विदेश में इस खेल के जरिए नाम कमा चुके हैदराबाद के अली बन्धुओं का।
घोड़ा सबसे महत्वपूर्ण
पोलो के लिए किसी भी खिलाडी के पास अच्छे नस्ल को घोड़े होना आवश्यक है। जितनी अच्छी नस्ल उतने ज्यादा दाम। कोई भी घोड़ा तीन साल का होने के बाद उसे पोलो खेलने को तैयार करने का प्रशिक्षण शुरू होता है। यह प्रशिक्षण कम से कम दो साल तक चलता है। इस प्रशिक्षण के जरिए घोड़ों को इसके सवार के इशारों पर तेज-धीमे दौड़ना सिखाया जाता है।
साथ ही मैदान के बीच मैच के दौरान दौड़ने वाले अन्य आठ-नौ घोड़ों की दौड़ के बीच बेहरतीन तालमेल कर संतुलन बनाए रखना सिखाया जाता है। इसके लिए प्रत्येक खिलाडी का अपना अलग से स्टाफ होता है। ये लोग इन घोड़ों की पूरी देखभाल करते हैं।
समय-समय पर टीकाकरण के साथ ही अन्य चिकित्सा सुविधा की भी दरकार रही है। इनके खाने का बाकायदा डाइट चार्ट बनता है। उसी के अनुरूप खाना दिया जाता है। पोलो के पूर्व खिलाड़ी हर्षवर्द्धन सिंह का कहना है कि घोड़ा पालना आसान नहीं है। यह काफी महंगा शौक है।
उनके पिता कर्नल किशन ने पोलो के खेल में देश-विदेश में काफी नाम कमाया। ऐसे में उनके घर में घोड़े पालने की परम्परा चली आ रही है। उनका कहना है कि इस परम्परा को निभा रहे हैं लेकिन यह काफी मंहगा है। अकेले बशीर के पास तेरह व हमजा के पास दस घोड़े हैं जबकि हर्षवर्द्धन के पास सात-आठ घोड़े। वहीं जोधपुर पोलो एसोसिएशन के पास स्वयं के बीस घोड़े हैं।एसोसिएशन के सचिव कर्नल उम्मेद सिंह का कहना है कि घोड़े पालना आसान नहीं।
खर्चा भारी आवक कम
घोड़ों को पालने में भारी खर्चा आता है, लेकिन आवक नाम मात्र की है। वह भी देश के प्रसिद्ध खिलाड़ियों की ही हो पाती है। पांच हैंडी केप के खिलाडी बशीर अली का कहना है कि देश में इस खेल में फिलहाल प्रायोजक नाम मात्र के ही हैं।
कुछेक कंपनियां खिलाडिय़ों को प्रायोजित करती हैं लेकिन प्रायोजक सिर्फ चार-पांच दिन चलने वाले एक कप के लिए ही मिलते हैं। उनका कहना है कि एक हैंडी केप के खिलाड़ी को वर्तमान में एक टूर्नामेंट के लिए महज पच्चीस-तीस हजार रुपए ही मिल पाते हैं जबकि यह राशि कम से कम एक लाख रुपए तो होनी ही चाहिए।
दूसरी तरफ उनके भाई चार हैंडी केप के खिलाड़ी हमजा अली का कहना है कि भारत में पोलो सत्र महज चार महीने ही चलता है जबकि घोड़ों को खाने और इलाज के लिए पैसा बारह माह चाहिए।
ऐसे में नए खिलाडी इस खेल से जुड़ने से घबराते हैं।
हमजा का कहना है कि देश के नामी खिलाड़ी होने के बावजूद उनकी स्वयं की आवक इतनी नहीं है कि खर्च पूरा पड़ सके। ऐसे में हर माह घर पर फोन कर पिता से पैसा मंगाना पड़ता है।
परिवहन मुश्किल
देश में जयपुर, जोधपुर, दिल्ली व मुम्बई में पोलो सत्र के तहत मैच खेले जाते हैं। इन स्थानों पर स्थानीय आयोजक भी कुछ घोड़े उपलब्ध कराते हैं, लेकिन अधिकांश खिलाड़ी अपने घोड़े लेकर जाते हैं। घोड़ों का एक स्थान से दूसरे के लिए परिवहन बहुत सावधानी से करना पड़ता है।
रास्ते में किसी प्रकार की गड़बड़ी होने पर घोड़ा हमेशा के लिए इस खेल के लायक नहीं रहता। ऐसे में खिलाडी को बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है। कई बार खेल के दौरान घोड़े भी बुरी तरह से घायल हो जाते हैं।
जोधपुर में कुछ वर्ष पूर्व हर्षवर्द्धन सिंह के घोड़े की मैच के दौरान टांग टूट गई। इसके बाद यह घोड़ा उनके लिए बोझ बन गया। ऐसे में घोड़ों के परिवहन के लिए अतिरिक्त भाड़ा दिया जाता है ताकि ट्रक चालक घोड़ों को सहजता के साथ गंतव्य तक पहुंचाए।
जांच की लम्बी प्रक्रिया
घोड़ों को एक शहर से दूसरे शहर तक ले जाने से पहले उनके खून की जांच जरुरी है। इनके खून की जांच सिर्फ हरियाणा के हिसार में होती है। कुछ वर्ष पूर्व देश के कुछ घोड़ों में फैली बीमारी के बाद से यह जांच अनिवार्य कर दी गई। इसके बाद से घोड़ों के परिवहन से पूर्व जांच की जाती है। इसके तहत घोड़ों का खून जांच के लिए हिसार भेजा जाता है। वहां से रिपोर्ट मिलने में कई बार बहुत अधिक समय लग जाता है। ऐसे में घोड़े खड़े रहते हैं।
बेच दिए थे सारे घोड़े
बशीर और हमजा तीन वर्ष पूर्व यहां से अपने सारे घोड़े बेच कर अर्जेंटीना में पोलो खेलने चले गए। वहां दो साल तक खूब पोलो खेला, लेकिन एक घटना ने उन्हें फिर से अपने घर आने पर मजबूर कर दिया।
बशीर का कहना है कि अर्जेंटीना में बहुत अधिक पोलो खेला जाता है। पूरे साल वहां यह खेल चलता है लेकिन वहां सबसे बड़ी बाधा सुरक्षा की है। एक बार बशीर व हमजा को कुछ लोगों ने बन्दूक दिखा लूट लिया।
पुलिस में शिकायत दर्ज कराने गए तो जवाब मिला आप बच गए यह बड़ी बात है। इसके बाद उन्हें हिन्दुस्तान लौट कर आना पड़ा।
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