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- मौताणा और डायन प्रथा पर रोक को बने कड़ा कानून
मौताणा और डायन प्रथा पर रोक को बने कड़ा कानून
- राजस्थान उच्च न्यायालय ने जताई नाराजगी
जोधपुर। प्रदेश में मौताणा व डायन प्रथा को लेकर बढ़ रही घटनाओं पर राजस्थान उच्च न्यायालय ने कड़ा रूख अपनाते हुए राज्य सरकार को सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि वह अगली सुनवाई से पहले इस संबंध में कड़ा कानून बनाए, ताकि ऐसी कुरीतियों पर रोक लग सके। न्यायालय ने साफ कहा कि यदि ऐसा नहीं होता है तो मजबूरन न्यायालय को राजस्थान को महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के संदर्भ में असंवेदनशील व पिछड़ा राज्य घोषित कर देना पड़ेगा।
राजस्थान उच्च न्यायालय में आज प्राथीर् शंकर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सुनील अम्बवानी व न्यायाधीश प्रकाश गुप्ता की खण्डपीठ ने साप शब्दों में कहा कि प्रदेश में इस तरह की घटनाओं पर प्रभावी कानून के जरिए रोक लगनी चाहिए। इस मामले की सुनवाई में आज राज्य सरकार की ओर से जवाब पेश करना था। राज्य सरकार ने जनवरी 2011 से प्रदेश में अब तक हुई ऐसी घटनाओं का ब्यौरा न्यायालय में पेश किया। लेकिन राज्य सरकार न्यायालय को यह नहीं बता पाई कि इन मामलों में उसकी तरफ से क्या एक्शन लिया गया। प्राथीर् शंकर के वकील संजीत पुरोहित ने बहस के दौरान कहा कि इस तरह की घटनाएं पूर्व में झारखण्ड, बिहार व छत्तीसगढ में होती थी। वहां की सरकारों ने इसकी रोकथाम के लिए प्रभावी कानून बनाए। इसके बाद से इस तरह की घटनाओं में काफी कमी आई। जबकि राजस्थान में इस तरह का कानून वर्ष 2011 से लम्बित चल रहा है। बिल तैयार होने के बावजूद राज्य सरकार इसे पारित नहीं कर पा रही है। उन्होंने कहा प्रदेश की पूर्व राज्यपाल मारग्रेट अल्वा ने भी अपने कार्यकाल के दौरान राज्य सरकार का ध्यान इस तरफ दिलाया था, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला।
दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद खण्डपीठ ने राज्य सरकार की तरफ से उपस्थित हुए अतिरकि्त महाधिवक्ता पीएस भाटी से कहा िक इस मामले की अगली सुनवाई 11 फरवरी 2015 को होगी। तब तक राज्य सरकार इस मामले में कड़ा कानून बना ले। अन्यथा न्यायालय राजस्थान को महिलाओं के लिए असंवेदनशील व पिछड़ा राज्य घोषित कर देगा।
उल्लेखनीय है कि चित्तौडगढ क्षेत्र के एक युवक शंकर की मां को गांव के कुछ लोगों ने डायन बता कर मार डाला। इसके बाद उस पर मौताणे की राशि देने का बी दबाव बनाया गया। इस पर शंकर ने उच्च न्यायालय में क्राइम पिटीशन दायर की। न्यायालय के ध्यान में यह बात लाई जाने पर न्यायालय ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि राजस्थान में अभी तक ऐसी घटनाएं हो रही है। इस पर न्यायालय ने इसे जनहित याचिका मानते हुए इस मामले की सुनवाई शुरू की।