रायपुर। महासमुंद जिले के सिरपुर की ऐतिहासिक विशेषताओं का केंद्र है वहां का लक्ष्मण मंदिर। यह सिर्फ स्मारक नहीं, बेपनाह प्यार निशानी भी है। इसका निर्माण ताजमहल से 11 सौ साल पहले रानी वासटादेवी ने राजा हर्षगुप्त की याद में करवाया था।
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प्यार की इस खूबसूरत निशानी के बारे में... - वासटादेवी और हर्षगुप्त की प्रेम कहानी का उल्लेख चीनी यात्री व्हेनसांग ने अपने यात्रा-वृत्तांत में किया था।
- वे छठवीं शताब्दी में सिरपुर आए थे। उनके यात्रा वृत्तांत के आधार पर ही सिरपुर में खुदाई चल रही है। तीन साल पहले खुदाई में मिले अवशेषों में यह सामने आया कि इस मंदिर का निर्माण 635-640 ईस्वी के बीच हुआ था।
- वासटादेवी मगध नरेश सूर्यवर्मा की बेटी थीं जिनका विवाह श्रीपुर (अब सिरपुर) के राजा हर्षगुप्त से हुआ था। खुदाई में प्राप्त शिलालेखों के अनुसार हर्षगुप्त की मौत के बाद रानी ने उनकी याद में इस मंदिर का निर्माण करवाया था।
मिट्टी की ईंटों से बना है मंदिर
- सिरपुर स्थित लक्ष्मण मंदिर मिट्टी की लाल ईंटों से बना है। यहां भगवान विष्णु के दशावतार अंकित किए गए हैं। खास बात यह है कि संरक्षण की खास कोशिश नहीं किए जाने के बावजूद अपने निर्माण के करीब 1500 साल बाद भी यह मंदिर अपने मूल रूप में खड़ा है।
- यह मंदिर दक्षिण कौशल की शैव और मगध की वैष्णव संस्कृति के मिलन का भी गवाह है। यूरोपियन साहित्यकार एडविन एमरल्ड ने ताजमहल को 'जीवित पत्थरों से निर्मित अगाध प्रेम' की संज्ञा दी, वहीं लक्ष्मण मंदिर को लाल ईंटों से बना 'नारी के मौन प्रेम का साक्षी' बताया।
बाढ़-भूकंप भी नहीं पहुंचाया पाया नुकसान
चीनी यात्री व्हेनसांग के यात्रा-वृत्तांत के अनुसार छठवीं शताब्दी में सिरपुर एक आधुनिक राजधानी थी जहां विदेशों से व्यापार होता था। इसे वैभव की नगरी कहा जाता था। आधुनिक बाजार, अस्पताल, बंदरगाह, गहने और औजार के कारखाने होने के सबूत भी मिले हैं। इतिहासकारों के अनुसार 12वीं शताब्दी में भयानक भूकंप आया था जिससे पूरा सिरपुर जमींदोज हो गया था। इसके बाद 14वीं-15वीं सदी में महानदी की विकराल बाढ़ में वैभव की यह नगरी पूरी तरह तबाह हो गई। लेकिन भूकंप और बाढ़ की त्रासदी के बाद भी लक्ष्मण मंदिर प्यार की अमर निशानी के रूप में खड़ा रहा।
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