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रातोंरात हीरो हीरो बन गया था ये आदिवासी लड़का, कहलाता था टाइगर ब्वाय

6 वर्ष पहले
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रायपुर. एनिमेशन फिल्म 'जंगल बुक' के काल्पनिक हीरो 'मोगली' की कहानी तो आपने सुनी ही होगी, लेकिन आज हम बता रहे हैं रियल 'मोगली' की कहानी। आज से 60 साल पहले एक आदिवासी बच्चे चेंदरू की एक बाघ के साथ ऐसी दोस्ती हो गई थी कि वह उसी के साथ खाता-पीता, खेलता और सोता था। इस रियल स्टोरी पर एक स्वीडिश डायरेक्टर ने फिल्म भी बनाई जिसने चेंदरू को इंटरनेशनल 'स्टार' बना दिया था। क्या है पूरी कहानी...
dainikbhaskar.com ‘वनवासी’ सीरीज के तहत बता रहा है छत्तीसगढ़ की जनजातियों से जुड़ी अनोखी बातों के बारे में। इसी कड़ी में आज पढ़िए ‘रियल मोगली’, ‘टाइगर ब्वॉय’ और ‘टार्जन’ के नाम से मशहूर चेंदरू की ट्रैजिक स्टोरी, जो बाघ से दोस्ती के कारण छोटी उम्र में ही दुनिया में छा गया था...
ऐसे हुई दोस्ती
चेंदरू मंडावी मुरिया जनजाति का लड़का था और बस्तर क्षेत्र के नारायणपुर जिले के गढ़बेंगाल गांव का रहने वाला था। बचपन में ही उसके पिता और दादा ने एक बाघ का बच्चा लाकर उसे दिया तो चेंदरू उसी के साथ दोस्त की तरह रहने लगा। वह उसे टेम्बू बुलाता था।
स्वीडिश डायरेक्टर ने बनाई फिल्म
आदमखोर जानवर और आदमी के बच्चे की अनोखी दोस्ती की चर्चा ईसाई मिशनरियों के जरिए स्वीडन के ऑस्कर विनर फिल्म डायरेक्टर आर्ने सक्सडॉर्फ तक पहुंची। सक्सडॉर्फ ने चेंदरू पर फिल्म बनाने की सोची और पूरी तैयारी के साथ बस्तर पहुंच गए। उन्होंने चेंदरू को ही फिल्म के हीरो का रोल दिया और यहां रहकर दो साल में शूटिंग पूरी की। 1957 में फिल्म रिलीज हुई- 'एन द जंगल सागा', जिसे इंग्लिश में ‘दि फ्लूट एंड दि एरो’ के नाम से जारी किया गया।
2 रुपए डेली पर किया काम
इस फिल्म में 10 साल के चेंदरू ने बाघों और तेंदुओं के साथ काम किया था और उसकी मजदूरी थी रोज के दो रुपए। फिल्म में दिखाया गया कि चेंदरू का दोस्त गिंजो एक तेंदुए को मारने के दौरान मारा जाता है, जिसके बाद किसी तरह चेंदरू की दोस्ती तेंदुओं और बाघों से हो जाती है। फिल्म को 1958 में कान फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया।
विदेशों में देखा ग्लैमर
फिल्म के रिलीज होने के बाद चेंदरू को भी स्वीडन और बाकी देशों में ले जाया गया। उस दौरान वह महीनों विदेश में रहा। वह जहां-जहां भी जाता था, उसकी एक झलक पाने के लिए लोग उमड़ पड़ते थे। फिल्म का संगीत देने वाले पं. रविशंकर तब अपनी पहचान बनाने के लिए स्ट्रगल कर रहे थे और लोग उन्हें चेंदरू के संगीतकार के तौर पर जानने लगे थे।
... और एकाएक आ गया अर्श से फर्श पर
विदेशों की चकाचौंध से निकलकर जब चेंदरू गांव लौटा तो उसका सामना फिर से असल जिंदगी से हुआ। कुछ महीनों तक देखा हुआ ग्लैमर उसे बेचैन करने लगा। वह गढ़ेबंगाल लौटने के बाद सालों तक असामान्य-सा व्यवहार करता रहा और अलग-थलग रहने लगा। एक समय ऐसा भी आया जब बाहर से मिलने आने वाले लोगों को देखते ही वह जंगलों की ओर भाग जाता था। वह पैंट-शर्ट पहने वालों को देखकर घबरा जाता था।
गुमनामी में हुई मौत
लंबे समय तक गुमनाम रहे चेंदरू को अगस्त 2013 में पैरालिसिस अटैक हुआ। सोशल मीडिया पर खबर फैली तो एक जापानी महिला और प्रदेश के एक मंत्री ने कुछ आर्थिक मदद की। हालांकि, चेंदरू को बचाया नहीं जा सका और 18 सितंबर 2013 को उसकी मौत हो गई।
... तो गुमनाम नहीं रहता टाइगर ब्वॉय
- चेंदरू को आर्ने सक्सडॉर्फ गोद लेना चाहते थे, लेकिन उनकी पत्नी एस्ट्रीड से उनका तलाक हो जाने के कारण ऐसा हो नहीं पाया।
- सक्सडॉर्फ की मौत 4 मई 2001 को हो गई, जिसके बाद बुजुर्ग चेंदरू की ये उम्मीद भी खत्म हो गई कि डायरेक्टर मिलने आएंगे।
- तत्कालीन पीएम पं नेहरू ने चेंदरू को पढ़ने-लिखने पर नौकरी का आश्वासन दिया था, पर लौटकर वह पढ़ नहीं सका।
- बताया जाता है कि चेंदरू को विदेशों में मिली दूरबीन, चश्मा, जैसी कई चीजें धोखे से एक ठेकेदार ले गया।
- आखिरी वक्त तक उसके पास एस्ट्रीड की लिखी फोटो फीचर वाली किताब ‘चेंदरू’ रह गई थी, जिसमें बाघ के साथ उसकी फोटोज थीं।
आगे की स्लाइड्स में फिल्म की शूटिंग के दौरान लिए गए फोटोज...