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पुलिसवाली का गैंगरेप, १७ पुलिसवाले बने गवाह, और नतीजा यह

9 वर्ष पहले
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भाटागांव में महिला सिपाही से दुष्कर्म के बहुचर्चित मामले के आरोपी अदालत से छूट गए। जिस मामले में 17 पुलिसवाले गवाह थे उसमें पुलिस सबूत पेश नहीं कर सकी। उसके गवाहों के अलग अलग बयानों के कारण आरोपियों पर दोष साबित नहीं हो सका।

पुरानी बस्ती भाटागांव के सुनसान इलाके में महिला सिपाही से सामूहिक दुष्कर्म करने वाले आरोपी सबूतों के अभाव में बरी हो गए। पुलिस की थ्योरी और गवाहों का बयान न्यायालय में टिक नहीं सका। पुलिस साबित करने में नाकाम रही कि महिला आरक्षक के साथ आरोपियों ने दुष्कर्म किया है। विशेष सत्र न्यायाधीश ने संदेह का लाभ देते हुए दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। महिला सिपाही 27 मई 2012 की रात भाटागांव इलाके में सामूहिक दुष्कर्म की शिकार हुई थी। घटना की रिपोर्ट अगले दिन करवाई गई। महिला सिपाही से दुष्कर्म होने की घटना उजागर होने से पुलिस महकमे में खलबली मच गई। अफसरों ने आरोपियों को पकडऩे के लिए पूरी ताकत झोंक दी। आनन-फानन में भाटागांव इलाके रहने वाले राम नारायण सोनकर और राकेश सोनकर को गिरफ्तार किया। उनके खिलाफ धारा दुष्कर्म और एसटीएससी एक्ट के तहत कार्रवाई की गई। नौ महीने के भीतर ही इस चर्चित केस का फैसला सुनाया गया। आरोपी पक्ष के वकील बृजेश पांडे ने बताया कि कोर्ट में पुलिस की ओर से जितने दलीलें और सबूत पेश की वे साबित नहीं हो पाए। आरोपियों के खिलाफ 20 गवाह पेश किया गया। इसमें 17 पुलिस कर्मी थे।

आरोपियों को नहीं पहचाना : कोर्ट में महिला और उसका दोस्त आरोपियों को पहचान नहीं सके। वकील श्री पांडे का कहना है कि पहचान कार्रवाई में दुष्कर्म करने वाले वही हैं, यह भी साबित नहीं हो सका। फारेंसिक रिपोर्ट भी पीडि़ता के पक्ष में नहीं थी।

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