पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • पांच ऐसे गांव जो खुद बनाते हैं अपना बजट

पांच ऐसे गांव जो खुद बनाते हैं अपना बजट

9 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक

रायपुर। सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली पीडीएस के तहत गरीबों को अनाज देने की योजना चला रही है। जब इसका फायदा नहीं मिला तो इन्होंने खुद ही राइस और ग्रेन बैंक की स्थापना कर ली। अब इसके लिए हर साल कार्ययोजना बनाते हैं और बजट भी तैयार करते हैं। ब्याज के पैसे से गरीब और प्रतिभावान बच्चों को पढ़ाने के लिए भी योजना बनाई जा रही है। बैंक के बजट प्रावधान होता है कि बैंक से नए सदस्य जोडऩे के लिए कब क्या करना है। यही वजह है कि अब ये अनाज के लिए सरकार पर निर्भर नहीं हैं।

जानिए आखिर किन लोगों ने कहां पर बनाया है अनोखा बैंक, दिलीप जायसवाल की रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के मैनपाट में आदिवासियों की पहल सबसे अनूठी है। रोजाना खाना बनाने से पहले एक मुट्ठी चावल जमा कर यहां पांच ग्राम पंचायत के लोगों ने राइस बैंक ही बना लिया है। इनके पास औसतन हमेशा 50 क्विंटल से अधिक चावल है। जरूरतमंद को तत्काल चावल दिया जाता है तो चावल बेचकर समुदाय के प्रतिभावान बच्चों को पढ़ाया भी जा रहा।
छत्तीसगढ़ के शिमला के रूप में प्रसिद्ध मैनपाट में प्राकृतिक सौंदर्यता के अलावा आदिवासियों की एक पहल ऐसी है जो इस स्थान को खास बनाती है। मांझी जनजाति के लोगों की साझा पहल से यहां राइस और ग्रेन बैंक संचालित हो रहा है। मुख्यधारा में रहकर भी इन्हें तमाम योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा था।

गरीबी और बेरोजगारी के कारण कई घरों में चूल्हा तक नहीं जल पाता था। ऐसे में वर्ष २००९ में ग्राम केसरा, कुनिया, नर्मदापुर, लुरैना और बरिया ग्राम पंचायत के लोगों ने निर्णय लिया कि हर परिवार की महिला रोज खाना बनाने से पहले एक मुट्ठी चावल निकालकर अलग रखेगी।

सप्ताह में जितना चावल होता उसे शनिवार को एक जगह एकत्र किया जाना था। इसी चावल को जमा कर राइस बैंक बनाया गया और आज उनके पास ५० क्विंटल से अधिक का स्टाक है।
वहीं पुरुषों ने ग्रेन बैंक की स्थापना की है। इसके तहत सभी साल में एक बार सात किलो धान एक जगह जमा करते हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि अब समुदाय के किसी भी व्यक्ति को चावल की जरूरत पड़ती है तो वह दुकान नहीं बल्कि राइस बैंक जाता है।

राइस बैंक की अध्यक्ष मंजू मांझी ने बताया कि किसी के घर में शादी या अन्य आयोजन होने पर भी वे सहायता करते हैं। इसी महीने ग्राम नर्मदापुर में चार शादियां हुईं। इसमें जितना भी चावल लगा, बैंक ने दिया। इतना ही नहीं रिवाज के हिसाब से कन्यादान के लिए धान बैंक ने ही दिया।
ग्रीन बैंक के अध्यक्ष चंद्रबली बताते हैं कि उनके पास करीब ५० क्विंटल धान है। बैंक के सदस्यों ने बाकायदा लेन-देन का नियम भी बनाया है। इसके मुताबिक जरूरत पडऩे पर एक व्यक्ति को १० किलो चावल दिया जाता है। साल भर में उसे १२ किलो चावल लौटाना होता है। अगर वह दो किलो अधिक नहीं दे पाता है तो भी इसे स्वीकार कर लिया जाता है। ब्याज के रूप में मिलने वाले अधिक चावल को बेचकर प्रतिभावान बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है।

मेहमानों को खिलाने के लिए कुछ नहीं था
राइस बैंक स्थापना की परिकल्पना मैनपाट के जनपद उपाध्यक्ष भीनसरिया राम मांझी की है। वे बताते हैं कि मांझी जनजाति में काफी गरीबी है। उनके पास गरीबी रेखा से नीचे वालों के लिए बनने वाला लाल कार्ड भी नहीं है। ऐसे में शासन की योजनाओं का भी लाभ नहीं ले पाते। कार्ड बनवाने के लिए अधिकारियों से कई बार कहा गया लेकिन किसी ने नहीं सुना। ऐसे में राइस बैंक और ग्रीन बैंक की पहल से समुदाय में कोई परिवार भूखा नहीं सोता।
भीनसरिया राम मांझी ने हाल के ही एक वाकये को याद करते हुए बताया कि नर्मदापुर का नैहर मांझी परेशान हालत में शाम को बैंक पहुंचा। उसके घर में मेहमान आए थे लेकिन रात में न तो खुद के खाने के लिए चावल था और न ही मेहमानों के लिए। ऐसे में उसे तत्काल चावल दिया गया।

२६ और पंचायतों में बैंक खोलने की योजना
राइस बैंक और ग्रीन बैंक मैनपाट जनपद के हर पंचायत में खुले, इसके लिए काम शुरू हो गया है। लोगों को इससे हो रहे लाभ की जानकारी दी जा रही है।