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मां की मार में भी है प्यार

8 वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर.रायपुर

आज भी मां देती हैं गाइडेंस

कलेक्टर सिद्दार्थ परदेसी कहते हैं, आज इस पद पर सिर्फ मां की वजह से पहुंच पाया हूं। सिविल सर्विसेज की परीक्षा में मेहनत के साथ मनोबल बेहद जरूरी होता है। जब भी मैं थोड़ा निराश होता था, मां का विश्वास देखकर फिर से संघर्ष के लिए तैयार हो जाता था। मां मीना परदेसी अब भी पुणे में रहती हैं, बीच-बीच में वो यहां आती हैं। आज भी कोई समस्या होती है, तो मां से बात करता हूं। वे मुझे गाइडेंस देती हैं और सबकुछ आसान लगने लगता है।
मां के सामने आज भी बच्चा हूं
डीआईजी दीपांशु काबरा मां शोभा काबरा के सामने आज भी बच्चे बन जाते हैं। वे कहते हैं कि मां जब नागपुर से यहां आती हैं, तो बचपन की तरह मैं आज भी उनसे लिपट जाता हूं। आईएएस की तैयारी के लिए मैं पहली बार घर से दूर दिल्ली कोचिंग करने गया, तो होमसिकनेस फील होती थी। मां फोन पर कहती थी, मुझे पता है तुम कर लोगे। इसी का नतीजा था कि मैंने पहली ही कोशिश में सफलता हासिल की। मुझे गुस्सा बहुत आता था इसलिए बड़े होने तक मैंने मां की मार खाई है। लेकिन प्यार भी खूब मिला है।
मां सिर्फ प्यार करती है
एसएसपी ओपी पाल कहते हैं कि लाइफ में हमेशा मां सावित्री पाल ने मुझे ब्लाइंड सर्पोट किया। मैं जो करना चाहता था वे मेरे साथ खड़ी रहीं। कभी उन्होंनें मुझे डांटा तक नहीं। वे सिर्फ प्यार करती हैं। मैं यहां हूं पैरेंट्स गोरखपुर में रहते हैं। वे यहां आते जाते रहते हैं। मां को शिकायत है कि मैं दूर हूं और मुझे भी अब उनकी सेहत की चिंता लगी रहती है। मां पास रहे तो आप मजबूत हो जाते हैं।

मां के हाथ की अरहर दाल याद आती है
एनआईटी के डायरेक्टर सुदर्शन तिवारी मां मां परमजोत तिवारी के हाथों की बनी अरहर की दाल का स्वाद याद करते हुए कहते हैं कि मां के जैसी दाल कोई नहीं बना सकता। मां अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी यादें साथ हैं। मां खूब प्यार करती थी और डांटती भी थी। उस जमाने में भी उनके साथ मेरे संबंध दोस्त के जैसे रहे। दिल की हर बात मैं मां से कह दिया करता था।

मां को लगता था मैंने गलत विषय चुना
रविवि के कुलपति डॉ एसके पाण्डे अपनी मां को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। उनकी मां खेलन बाई अब इस दुनिया में नहीं है। डॉ पाण्डे कहते हैं कि मां पढ़ी लिखी नहीं थी, इसलिए मेरे पीएचडी करने का उन्हें बेहद गर्व था। कॉलेज की पढ़ाई के लिए मैं बुरीद गांव से रायपुर आया तो वे भी मेरे साथ आ गई। पर जब रिसर्च या जॉब के लिए मुझे बाहर काम से जाना पड़ता था तो उन्हें लगता था कि मैंने विषय गलत चुन लिया है। इकलौती संतान होने के कारण मां की दुनिया मुझमें समाई थी। अंत समय तक वो मेरे साथ थी। आज भी उनका स्नेह और आशीर्वाद मेरे साथ है।

मां से सीखा अपडेट रहना
एम्स के डायरेक्टर डॉ नितिन नागरकर मां के साथ घंटों करेंट अफेयर और पॉलिटिक्स पर चर्चा करना बेहद मिस करते हैं। उनकी मां स्मिता नागरकर अब इस दुनिया में नहीं है। वे कहते हैं मां हमेशा करेंट अफेयर के बारे में अपडेट रहती थी। अपडेट रहना मैंने उनसे सीखा। पापा सॉफ्ट नेचर के थे और मां अनुशासन प्रिय। उनकी इच्छा थी मैं डॉक्टर बनूं और मैं डॉक्टर बन गया। आज भी वो दिन खूब याद आते हैं जब मेरे हॉस्टल से आने पर वो मेरी पसंद का खाना बनाकर रखती थी।

मां का चेहरा आज भी याद आता है
मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ एके शर्मा कहते हैं कि मैं सबसे ज्यादा मां का चेहरा याद करता हूं। मेरी मां यशोदा शर्मा अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन धर्म और संस्कृति के साथ मानवीयता बनाए रखने के लिए उनकी दी गई शिक्षा आज भी मेरे साथ है। जांजगीर से जब मैं पढऩे के लिए इंदौर हॉस्टल गया, तो शुरुआत में वे खूब रोती थी। मेरी शादी होने तक वो मुझे छोटा बच्चा ही मानती थी। घर आने पर खूब लाड़ प्यार होता था। लोगों का ख्याल रखना मैंने उन्हीं से सीखा।

मम्मी आज भी डांटती है
महापौर किरणमयी नायक भले ही सबको फटकार लगाती हो, लेकिन मम्मी शकुंतला देवी वर्मा की डांट उन्हें आज भी खानी पड़ती है। वे कहती है कि अगर अखबार में मेरे बारे में कुछ भी नेगेटिव छपा तो मम्मी खूब डांटती है। वे नहीं चाहती थी कि मैं पॉलिटिक्स में आऊं। वे आज भी कहती है घर संभाल और मस्त रह। मम्मी पढ़ाई के साथ सख्ती से घर का काम कराती थी। दसवीं क्लास से ही घर