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बाल मजदूर का दर्द हो या गांव की सुबह, चित्रों से हो रहा बयां
रायपुर। नजर आसमान पर उड़ती पतंग पर, लेकिन सिर पर ईंट का बोझा उठाकर नन्हें कदमों से आगे बढ़ता बाल श्रमिक का हौसला चेहरे पर साफ नजर आ रहा है। बाल श्रमिक की आंखें जैसे बयां कर रही हो कि वो भी इस उन्मुक्त आकाश में उडऩा चाहता है, लेकिन बाल मजदूरी करना उसकी मजबूरी है। लोगों की दर्द, खुशी, इच्छा, संघर्ष के कई रुप पेंटिंग के माध्यम से नजर आ रहा है। शिल्प वर्षा आर्ट एंड रिसर्च सोसाइटी द्वारा आयोजित छठवी वार्षिक प्रदर्शनी के दूसरे दिन भी कला प्रेमियों को राज्य के कलाकारों की पेंटिंग व स्कल्पचर देखने का मौका मिला। आर्ट गैलरी में लगी एग्जीबिशन में कलाकारों की परिचर्चा भी चल रही है।
ग्रामीण जीवन का चित्रण भी: शहर की भागमभागी से दूर गांव की शांति हर किसी को पसंद आती है। शायद कलाकार ने यही सोचकर अपनी भावनाएं अपनी पेंटिंग में व्यक्त की है। जिसमें एक ग्रामीण दृश्य दिखाया है। बीच में कच्ची सड़क और सड़कों के दोनों तरफ बने कच्चे मकान। कुछ मकानों की दीवार उखड़ी हुई हैं तो कुछ की छत टूटी हुई है। कोई अपने बैलगाड़ी में बैठकर गांव के हाट के तरफ जा रहा है तो कोई बैला जोड़ी को हांकता हुआ खेत की तरफ चल रहा। गांव के इस सुबह के दृश्य में जहां बड़े अपने कामों की तरफ निकल पड़े हैं, वहीं बच्चे मुंडेर पर खेल रहे हैं। बांस के बीच से गुजरी बिजली के तार पर बैठे दो पक्षी को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानों वे पूरा गांव को एकटक लगाकर देख रहे हो।
नामी कलाकारों को फॉलो करें: प्रदर्शनी में कलाकारों की परिचर्चा का आयोजन भी हो रहा है। जिसमें राजेंद्र सुनगरिया ने कहा कि ऐसे आयोजन में सरकार का सहयोग आवश्यक है। ताकि नियमित रुप से ऐसे आयोजन हो सके और कलाकारों को आगे आने का अवसर प्राप्त हो। दीपक वर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ आर्ट को आगे लाने के लिए राज्य के कलाकारों को सामने आना होगा। वे दूसरी विधाओं के अलावा छत्तीसगढ़ी आर्ट में भी ध्यान दें ताकि ज्यादा से ज्यादा अपने राज्य की कला को प्रचारित किया जा सके। विजय वर्गीस ने कहा कि नामी कलाकारों की टेक्निक को फालो करें। ताकि कुछ अच्छा सीखने का अवसर मिलें।