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भारत में 100 मे से 2 फिल्में ही उपन्यास पर बनती है...विष्णु खरे फोटो

7 वर्ष पहले
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रायपुर। 'छत्तीसगढ़ उपन्यासों का गढ़ है। यहां ऐसे-ऐसे उपन्यासकार हुए हैं, जिनके उपन्यासों पर फिल्म बनाई जाए तो वे सफलता के नए आयाम बुन सकती हैं। यही नहीं यहां की लोकसंस्कृति भी अभी तक परदे की दुनिया से नदारद है। यह दुर्भाग्य की बात है कि देश में बनने वाली 100 फिल्मों में से केवल 2 फिल्में ही उपन्यासों पर आधारित होती हैं और जो फिल्में बनती हैं उनकी कहानी में बदलाव कर दिया जाता है।'

ये बातें कही फिल्म क्रिटिक विष्णु खरे ने। मौका था कालीबाड़ी स्थित डिग्री गर्ल्स कॉलेज में साहित्य और सिनेमा के अंतर्संबंध विषय पर आयोजित व्याख्यान का जिसमें विष्णु खरे मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित थे। कार्यक्रम का आयोजन हिन्दी साहित्य परिषद की ओर से किया गया था। दैनिक भास्कर से बातचीत के दौरान श्री खरे ने फिल्म जगत से जुड़ी कई बातें शेयर की।

नहीं हैं उपन्यास पर ज्यादा फिल्में
वे बताते हैं कि बॉलीवुड में 100 में से 2 फिल्में ही उपन्यास पर बनती हैं। उनमें भी इंग्लिश लिटरेचर पर अधिक फोकस किया जाता है। हिन्दी उपन्यास पर बनने वाली फिल्मों को रूप बदलकर प्रदर्शित किया जाता है। साथ ही ऐसी फिल्मों पर पैसा लगाने वाले भी कम हैं।

कॉपी की जा रही है स्क्रिप्ट
फिल्मों से जुड़ी विवादित बातों पर उन्होंनें 3 ईडियट मूवी का एग्जांपल देते हुए बताया कि बॉलीवुड में उपन्यासों के जरिए बिना लेखक की परमिशन के उसके थॉट और किरदार कॉपी किए जा रहे हैं। यह एक बड़ी समस्या है जिससे आज का लेखक जूझ रहा है।

कर देते है मॉडीफाइड
उपन्यास आधारित फिल्मों की बात पर उन्होंनें कहा कि नॉवल्स पर फिल्में बनती तो है लेकिन वो जिस रूप में हमारे सामने आती है वो मॉडीफाइड होता है। अगर असल उपन्यास की कथा को छेड़े बिना फिल्म बने तो वह बैन हो जाएगी।
फिल्म बनाने से पहले साहित्य की जानकारी जरूरी...
वे बताते हैं कि फिल्मों की जान स्क्रिप्ट होती है। बेहतर स्क्रिप्ट लेखन के लिए साहित्य की जानकारी जरूरी है। फिल्मों में साहित्यिक शब्दों का यूज कोई आज की बात नहीं हैं। बांग्ला का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वहां फिल्मों को किताब के नाम से ही जाना जाता है।

नहीं बनाते फिल्में
उपन्यास आधारित फिल्मों की बात करते हुए उन्होंनें कहा कि उपन्यास में कई किरदार है जिन्हें अभी तक पहचान नहीं मिली है। शकुंतला पर 70 सालों से कोई फिल्म नहीं बनी। इसी प्रकार अगर महाभारत पर सही तरीके से फिल्म बने तो कम से कम 150 करोड़ में बनेगी।

यह रहे मौजूद
कार्यक्रम में संजीव बख्शी के अलावा नरोत्तम यादव, मनोज वर्मा, दीपक पाचपोर, नंदकुमार कंसारी, अमिताभ बैनर्जी, रमेश अनुपम, वेणुगोपाल आदि मौजूद थे कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वरंजन ने की।