रायपुर। भारी अव्यवस्था के बीच मंगलवार को मेडिकल कॉलेज के लेक्चर हॉल नंबर एक में मेडिकल व डेंटल की खाली सीटों को भरने के लिए काउंसिलिंग शुरू हो गई। लेक्चर हॉल की क्षमता महज 150 स्टूडेंट की है, लेकिन यहां 300 से ज्यादा स्टूडेंट बैठे। कई स्टूडेंट व परिजनों को गलियारा में रहना पड़ा। देर रात तक खाली सीटों का आवंटन कर दिया जाएगा। तकनीकी सलाहकार डीएमई डॉ. एनके गांधी ने बताया कि एडमिशन लेने वाले स्टूडेंट भी अपग्रेड की आशा में आए हैं। इससे भीड़ बढ़ गई है।
मेडिकल की बची 40 सीटों के लिए आखिरी चरण की काउंसिलिंग मंगलवार को दोपहर 12 बजे से मेडिकल कॉलेज में शुरू हुई। यह काउंसिलिंग मैन्यूअल थी। 40 में 30 सीटें निजी डेंटल कॉलेज की है।
निजी कॉलेज की सीटों को लेकर बवाल हो सकता है। दरअसल पिछले साल भी स्टेट कोटे की 32 सीटें मैनेजमेंट कोटे में कन्वर्ट हो गई थी। इस बार भी ऐसा ही होने की संभावना है। दरअसल इसमें डीएमई के अधिकारियों की सोची-समझी चाल है। अधिकारी नहीं चाहते की स्टेट कोटे की सीट निजी कॉलेज में फुल हो।
इतना बड़ा विवाद और डीएमई गए छुट्टी मनाने
मेडिकल सीटों के आवंटन में भारी गड़बड़ी के बीच डीएमई प्रताप सिंह गृह राज्य उत्तराखंड चले गए हैं। वे 13 सितंबर को गए हैं और 18 सितंबर को लौटेंगे। जानकार बता रहे हैं कि काउंसिलिंग में गड़बड़ी के बाद पीएस हेल्थ डॉ. आलोक शुक्ला ने डीएमई की जमकर खबर ली। इसके बाद से ही वे छुट्टी पर चले गए हैं। ऐसा पहली बार हुआ है कि मेडिकल जैसे महत्वपूर्ण काउंसिलिंग चल रही हो और विभाग का मुखिया ही छुट्टी पर चला जाए।
प्रोबेशन पीरियड खत्म नहीं और बना दिए डिप्टी डायरेक्टर
डिप्टी डायरेक्टर डॉ. त्रिपाठी का प्रोबेशन पीरियड अब तक खत्म नहीं हुआ है, लेकिन आश्चर्य की बात है कि वे पिछले दो साल से चिकित्सा शिक्षा विभाग के डिप्टी डायरेक्टर के रूप में काम कर रहे हैं। इसके लिए वे पात्र भी नहीं है। पीएससी से चयन के बाद उन्होंने मई २०१२ में मेडिकल कॉलेज ज्वाइन किया था। भर्ती नियम के अनुसार एसोसिएट प्रोफेसर अथवा जिनकी सेवा पांच साल हो गई हो, वह डिप्टी डायरेक्टर बन सकता है। इस हिसाब से डॉ. त्रिपाठी काफी जूनियर है। वे रायपुर मेडिकल कॉलेज के फिजियोलॉजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। कुछ सीनियर डॉक्टरों का आरोप है कि शासन के आला अधिकारियों की मेहरबानी से वे अपात्र होते हुए व बड़ी गलती के बाद भी अपने पद पर बने हुए हैं। यही उनका ट्रांसफर राजनांदगांव हो गया है, लेकिन अधिकारियों की मेहरबानी से रायपुर में ही जमे हुए हैं। सूत्रों के अनुसार उन्होंने अपनी पहुंच का इस्तेमाल करते हुए अपना ट्रांसफर स्वयं करवाया है, लेकिन राजनांदगांव नहीं गए हैं।
बच्चों का इलाज करने के बजाय उलझे हैं काउंसिलिंग में
डॉ. त्रिपाठी के साथ पीडियाट्रिक विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ओंकार खंडवाल काउंसिलिंग का काम पिछले तीन साल से देख रहे हैं। बच्चों के इलाज के अलावा एमबीबीएस व पीजी स्टूडेंट को पढ़ाना उनका काम है, लेकिन काउंसिलिंग में उलझने के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। वे डॉ. त्रिपाठी से काफी सीनियर हैं, लेकिन उनके अंडर काम कर रहे हैं।
आईएफएस हैं, डिप्टी डीएमई के अनुसार काम
पहली बार किसी वन सेवा के अफसर प्रताप सिंह को डीएमई बनाया गया है। सूत्रों के अनुसार वे काउंसिलिंग व अन्य काम डिप्टी डीएमई की राय के अनुसार ही काम करते हैं। डीएमई को काउंसिलिंग का पहला अनुभव है, इसलिए वे पूरी तरह डॉ. त्रिपाठी पर निर्भर हैं।
बड़ी लापरवाही, लेकिन कार्रवाई नहीं
मेडिकल की 73 सीटों को बदलने या अलाटमेंट रद्द करने के मामले में काउंसिलिंग करने वाले अधिकारी पूरी तरह दोषी हैं। इसके बाद भी शासन किसी के खिलाफ अब तक कार्रवाई नहीं कर पाया है। चर्चा है कि शासन दोषी अधिकारियों को बचाना चाहते हैं।