( फोटो: मेडिकल काउंसिलंग का फाइल फोटो। )
रायपुर। चिकित्सा विभाग के अधिकारियों की लापरवाही के कारण इस बार फिर सरकारी कोटे की 12 मेडिकल सीटें निजी कॉलेज को चली गईं। सीटों के आवंटन में गड़बड़ी नहीं की गई होती तो ये सीटें भरी जा सकती थी। भिलाई के एक पालक विमलचंद जैन ने काउंसिलिंग में गड़बड़ी की लापरवाही की शिकायत मुख्यमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री से की है। दैनिक भास्कर ने पहले ही अंदेशा जताया था कि अधिकारी सरकारी सीटों को बेचने के फिराक में हैं। यह सच साबित हुआ। ऐन मौके पर डीएमई प्रताप सिंह भी छुट्टी मनाने के लिए गृह राज्य उत्तराखंड चले गए। वे गुरुवार को लौटने वाले हैं।
चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने 11 सितंबर की शाम अचानक मेडिकल की 73 व डेंटल की 12 सीटों को बदल दिया था। इसमें चंदूलाल चंद्राकर निजी मेडिकल कॉलेज में 59 स्टूडेंट का अलाट रद्द कर दिया था। इन्हें छह उम्मीदवारों का एडमिशन भी शामिल था। यहां स्टेट कोटे की 63 सीटों में 59 सीटों के अलाटमेंट को रद्द करना कई संदेह को जन्म दे रहा था। दरअसल पिछले साल काफी विवाद के बाद 32 सरकारी सीटों को मैनेजमेंट कोटे में कन्वर्ट कर दिया गया था। मंगलवार को देर रात तक हुई काउंसिलिंग में निजी कॉलेज में खाली 33 में 21 सीटों को भरा गया। यानी १२ सीट बच गई, जो मैनेजमेंट कोटे में कन्वर्ट हो गई है। रायपुर मेडिकल कॉलेज में फ्रीडम फाइटर की एक सीट खाली है। यह मामला कोर्ट में चल रहा है। कोर्ट से आदेश आते ही इस सीट को 30 सितंबर तक भर दिया जाएगा।
डेंटल कॉलेज के लिए नहीं मिल रहे स्टूडेंट
डेंटल कॉलेज के लिए महज दो क्वालिफाइड उम्मीदवार शामिल हुए। उन्हें बीडीएस की सीट अलाट कर दी गई है। दोपहर ढाई बजे तक डीएमई व कॉलेज का कोई भी अधिकारी नहीं पहुंचा था। नॉन क्वालिफाइड 20 से ज्यादा स्टूडेंट भी पहुंचे थे, जो सीट नहीं मिलने से मायूस होकर लौट गए। यहां स्टेट कोटे की ८२ में केवल सात सीट भर पाई है। बाकी 75 सीट खाली है। वहीं आल इंडिया कोटे की 15 में केवल एक सीट भरी है। यानी 89 सीट खाली है। अधिकारियों के अनुसार 25 से 27 के बीच खाली सीटों को भरने के लिए काउंसिलिंग कराई जा सकती है।
अधिकारियों ने बेच दी मेडिकल सीटें
भिलाई के कमलचंद जैन ने मुख्यमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री को ज्ञापन सौंपकर सरकारी कोटे की मेडिकल सीटें बेचने का आरोप लगाया है। उन्होंने दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। उनका दावा है कि डीएमई के अधिकारियों ने जान-बूझकर ऐसी स्थिति निर्मित की, जिससे सरकारी कोटे की मेडिकल सीटें निजी कॉलेज को मिल जाए।
मेडिकल की एक सीट 40 लाख की
सरकारी कोटे की सीटें मैनेजमेंट में तब्दील होने के बाद लाखों रुपए में बिक रही है। सूत्रों के अनुसार एडमिशन की आखिरी तारीख नजदीक होने के कारण कॉलेज प्रबंधन ने 40 लाख रुपए तक एक सीट को बेच रहा है। सरकारी कोटे में रहने पर यह सीट महज 4.65 लाख रुपए की थी।
कोई लापरवाही नहीं हुई
हमने नियमानुसार प्रवेश दिया है। कोई सीट बेचन का अारोप लगा रहा है तो यह गलत है। स्टेट कोटे की बची मेडिकल की सीट नियमानुसार निजी कॉलेज को सरेंडर किया गया है। सूची में लापरवाही साफ्टवेयर की गड़बड़ी थी।
डॉ. सुमीत त्रिपाठी, डिप्टी डीएमई