(फोटो: काछन देवी के रूप में तेरह साल की विशाखा को कांटे के झूले पर बैठाते लोग)
दुनिया में कोई त्योहार इतना लंबा नहीं चलता जितना की बस्तर का दशहरा। पूरे 75 दिनों तक चलने वाला यह पर्व अपने-आप में अनूठे रीति-रिवाजों को समेटे हुए है। इस अनूठे त्योहार को यहां सैकडों सालों से निभाया जा रहा है। बुधवार से इस दशहरे की एक खास रस्म शुरू हुई।
रायपुर-जगदलपुर। बुधवार को काछन गादी रस्म के साथ बस्तर दशहरा की औपचारिक शुरुआत हो गई। 13 साल की विशाखा ने देवी का श्रृंगार किया, उसकी विधिविधान से पूजा हुई और फिर वह कांटों के झूले पर बैठ गई। पूरे 9 दिनों के लिए।
काछन देवी के रूप में बैठी विशाखा से बस्तर राजपरिवार के प्रतिनिधि ने राज्य की खुशहाली का आशीर्वाद और बस्तर दशहरा के औपचारिक शुरुआत की अनुमति ली, अब गुरुवार से बस्तर दशहरे के विभिन्न आयोजन शुरू हो जाएंगे।
काछन गादी की रस्म
नवरात्र के पहले दिन काछन गादी की रस्म निभाई जाती है। रस्म के अनुसार मिरगान माहरा जाति की छोटी कन्या पर नवरात्रि से पहले काछन देवी सवार होती हैं। कन्या को देवी का श्रृंगार कराया जाता है, उसे काछनग़ुडि अर्थात कांटे के झूले पर लिटाया जाता है उसके बाद 9 दिनों तक काछन देवी के रूप में उसकी पूजा की जाती है। इस दौरान वह लोगों की समस्याओं का समाधान भी करती है।
छह साल से कांटे के झूले पर बैठ रही है विशाखा
विशाखा जब 7 साल की थी तब से काछन गादी की रस्म निभाती आ रही है। कांटों के झूले पर बैठने पर दर्द नहीं होता ? यह पूछते ही विशाखा कहती है कि उसे बिल्कुल भी दर्द नहीं होता, उसे विश्वास है कि देवी मां उसे इसके लिए शक्ति देती हैं। विशाखा की मां और नानी भी बचपन में इस परंपरा को निभा चुकी हैं।
छुआछूत मिटाने का देते हैं संदेश
मूलत: बुनकर व्यवसाय से जुड़ी मिरगान माहरा जाति को बस्तर की जातीय व्यवस्था के अनुसार निचली जाति में गिना जाता है, लेकिन बस्तर के महाराजा ने इस जाति को महत्व दिया और इसके जरिए छुआछूत मिटाने का संदेश दिया।
75 दिनों का होता है पर्व
बस्तर दशहरे की शुरुआत हरियाली अमावस्या से होती है और दशहरे के बाद तक इसकी रस्में चलती हैं। नवरात्र के नौ दिनों में इस त्योहार की विशेष धूम होती है। इसकी विचित्र परंपराएं बरबस ही लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं।
बस्तर दशहरे में दिखता है बस्तर का हर रंग
बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ अंचल के खास त्योहारों में से एक है, यह अपने तरह का इकलौता दशहरा है। साथ ही सबसे लम्बे समय तक चलने वाला त्योहार भी है। इसमें शामिल होने देश ही नहीं विदेशों से भी लोग बस्तर पहुंचते हैं। आदिवासियों की धार्मिक आस्था से जुडे इस त्योहार में बस्तर अंचल की विविध परंपराओं अद्भुत संगम भी देखने को मिलता है।
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नोट: सभी तस्वीरें छत्तीसगढ पर्यटन मंडल के आधिकारिक फेसबुक पेज से साभार ली गई हैं।