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विडंबना- दांत के डॉक्टरों को शिक्षाकर्मियों से कम वेतन, इसलिए बीडीएस में अरुचि

7 वर्ष पहले
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रायपुर। प्रदेश के जिला अस्पतालों व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में नियुक्त दांत के डॉक्टरों का वेतन शिक्षाकर्मी वर्ग तीन से भी कम है। यही कारण है कि कोई बीडीएस नहीं करना चाहता। पहली बार राजधानी स्थित एकमात्र सरकारी डेंटल कॉलेज में 100 में केवल नौ सीट भरी है। अब खाली सीटों को भरने के लिए कोई मौका भी नहीं है। 30 सितंबर के बाद खाली सीटें लैप्स हो जाएंगी।

प्रदेश के 146 ब्लॉक मुख्यालयों में दांत के डॉक्टरों को संविदा नियुक्ति दी गई है। उन्हें हर महीना 20 हजार रुपए वेतन दिया जा रहा है। शिक्षा कर्मी वर्ग तीन को 20 हजार रुपए से ज्यादा वेतन मिलता है। शिक्षाकर्मी दो व एक को 35 हजार रुपए वेतन मिल रहा है। दांत के डॉक्टरों की नियुक्ति पहली बार की गई है। स्थिति ये है कि अभी तक मरीजों के इलाज के लिए जरूरी डेंटल चेयर तक उपलब्ध कराया नहीं गया है। यही कारण है कि नियुक्ति के बाद भी दांत के डॉक्टर उपेक्षित है।

सेटअप में पद नहीं
सरकारी अस्पतालों में दांत के डॉक्टरों का पद स्वीकृत नहीं किया गया है। यही कारण है कि इन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती। जो नियुक्ति हुई है, वह संविदा है। यानी एक साल की नौकरी के बाद नियुक्ति की कोई गारंटी नहीं है। मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में भी दांत के डॉक्टर गिने-चुने हैं। प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल अंबेडकर में महज दो डॉक्टर हैं। ये डॉक्टर ही छह दिन ओपीडी व ओटी संभालते हैं।

प्रैक्टिस में भी कमाई कम
एमबीबीएस डॉक्टरों की तुलना में दांत के डॉक्टरों की प्रैक्टिस में कमाई कम है। एलोपैथी डॉक्टर जहां ओपीडी के लिए तगड़ी फीस लेते हैं, वहीं दांत के डॉक्टर 50 रुपए से ही काम चलाते हैं। प्रैक्टिस में कमाई कम होना भी स्टूडेंट को दांत का डॉक्टर बनने से रोक रहा है।

आयुर्वेद का डॉक्टर बनना स्वीकार
स्टूडेंट आयुर्वेद का डॉक्टर बनना चाहते हैं, लेकिन दांत का डॉक्टर नहीं। इस साल 50 से ज्यादा एआईपीएमटी क्वालिफाइड उम्मीदवार को बीडीएस मिल जाता। लेकिन उनकी उदासीनता ही रही कि ऑन लाइन काउंसिलिंग में शामिल होने के बाद भी उन्होंने बीडीएस नहीं लिया। कुछ लोगों ने सीट आबंटन के बाद भी एडमिशन नहीं लिया। कुछ ऐसे हैं, जिन्होंने एडमिशन के बाद सीट छोड़ दी।

सरकारी नौकरी नहीं तो क्या मतलब?
बीडीएस के लिए चयनित राकेश जायसवाल का कहना है कि सरकारी नौकरी नहीं मिलने से डेंटल कोर्स करने का कोई मतलब नहीं रह जाता। निजी प्रैक्टिस में भी कमाई नहीं है। एक अन्य छात्र संतोष साहू ने कहा कि जब तक सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी, डेंटल की सीटें ऐसी ही खाली रहेंगी। संविदा वालों को वेतन भी कम दिया जा रहा है।
शासन का निर्णय- डायरेक्टर
डेंटिस्टों का वेतनमान शासन ने तय किया है। शिक्षाकर्मियों से कम वेतन की बात सही है। इस पर निर्णय लेने का अधिकार प्रदेश सरकार को है। शिकायत आने पर वेतन संबंधी प्रस्ताव भेजा जा सकता है।