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भारत में एकवचन कुछ नहीं होता- अशोक बाजपेयी

7 वर्ष पहले
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रायपुर। राजधानी में आयोजित राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव में देश भर के साहित्यकार और कवि जुटे हैं। महोत्सव में शहर के साहित्य प्रेमियों को साहित्यकारों को सुनने और उनसे चर्चा करने का मौका मिल रहा है। इस बीच dainikbhaskar.com ने प्रसिद्ध प्रयोगवादी कवि अशोक वाजपेयी से खास बात की। पेश है कुछ अंश-
सवाल- ऐसी कौन सी कविता है, जो आप हमेशा याद करते हैं?
जवाब-
भारत में एक वचन कुछ नहीं है। न पहनावा, न भोजन, न रीति-रिवाज। हम तो बहुलतावादी है, तो एक कविता कैसी? यहां अंधेरे में, मैं घर जाना चाहता हूं, आत्महत्या के विरुद्ध जैसी कविताएं कुछ खास हैं।

सवाल- ऐसा कोई वाक्या जो आपको हमेशा याद आता हो?
जवाब-
एक बार पोते ने पूछा कि बाबा तुम इंटरनेशनल सेंटर जाओगे। हमने कहां हां। उसने कहां वहां कोई प्रोग्राम है। हमने कहां हां। उसने कहां कि वहां आपको बोलना है, तो हमने कहां है, तो उसने कहां कि बाबा तुम बहुत बोलते हैं। उस वक्त उसकी उम्र 4-5 वर्ष की होगी।

सवाल- इस दौर में कवि की क्या स्थिति है?
जवाब-
कवि की स्थिति वही है जो हर युग में रही है। न बहुत अच्छी और न खराब। हमेशा ही ऐसी रही है।

सवाल- क्या कविता पाठ भी रोजगारपरक हो सकती है?
जवाब-
वैसे कवि कविता-पाठ से ही रोजगार चलाते हैं। लेकिन बहुत कम जगह कविता रोजगारपरक है। बहुत बड़ा कवि जैसे नोबेल पुरस्कार ख्याति प्राप्त के लिए कविता रोजगार बनी है। हां अमेरिका में जैसे कवियों को कॉलेजों में लेक्चर और रीडिंग के लिए बुलाया जाता है। उसका पारिश्रमिक मिलता है।

सवाल- इसके लिए क्या करना चाहिए
जवाब-
बहुत सारे उपाय है। पर कोई करना नहीं चाहता। हिंदी समाज को अपनी भाषा और कवि से कोई सरोकार नहीं है। सरकारें भी कोई प्रयास नहीं करती। मप्र, छत्तीसगढ़ और बिहार में कुछ प्रयास भी रहे हैं, लेकिन हिंदी का सबसे बड़ा प्रदेश उत्तर प्रदेश भाषा को नष्ट करने में तुला है। ये बौनों के उन्नयन का युग है।

सवाल- ऐसे में छग में ये कार्यक्रम कैसा रहा?
जवाब-
अच्छे कार्यक्रम की शुरुआत है। लेकिन शहर से बहुत दूर किया गया। सरकार के पास शायद शहर में इतनी जगह नहीं होगी।