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किताबों में सीमित होकर ना रह जाए पक्षियों की प्रजातियां

8 वर्ष पहले
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उदयपुर. पक्षियों के प्रति मानवीय बेरुखी और जलीय क्षेत्रों में मानव का दखल कम नहीं हुआ तो आने वाले समय में गोरैया, ग्रीन मुनिया, कौवे, बगुला जैसे पक्षी सिर्फ किताबों में ही दिखेंगे। पक्षीविदों का कहना है कि जहां 90 के दशक में उदयपुर में हजारों की संख्या में पक्षी देखे जाते थे, वहीं, बीते वर्षों में जलीय और थलीय दोनों ही प्रकार की दर्जनों पक्षी प्रजातियों की संख्या में कमी आई है। कम होती संख्या में बत्तखें, हवासील, सारस, फ्लेमिंगो, स्टॉर्क जैसे जलीय पक्षी हैं तो बगुले, ग्रीन मुनिया, कौवे और गिद्ध सरीखे स्थलीय पक्षी भी शामिल हैं।

90 के दशक में थी 200 से अधिक प्रजातियां: वन्यजीव और पक्षी विशेषज्ञ डॉ. सतीश शर्मा के अनुसार नब्बे के दशक में उदयपुर जिले में करीब दो सौ जलीय, स्थलीय पक्षी प्रजातियों का अस्तित्व था। इनमें पचास प्रतिशत प्रवासीय पक्षी थे। बत्तखों की ही 16 प्रजातियों को पहचाना गया था। जबकि तीन प्रकार की हवासील, 2 हंस वार यानी फ्लेमिंगो प्रजाति, चार प्रकार के स्टॉर्क यहां पाए जाते थे। लेकिन इनकी संख्या में लगातार कमी आई है। दो हजार के दशक में इनकी तादाद कम हो गई।

डॉ. शर्मा के अनुसार बत्तखों और हवासील की तीन प्रजातियां लगभग लुप्त हो चुकी हैं। स्पॉट बिल्ड पैलिकन भी नहीं दिखाई देती। सारस शहरी आवासों से तो गायब हो ही चुके हैं, बाहरी क्षेत्रों में भी इनकी संख्या काफी घट चुकी है।

क्यों हैं पक्षी खतरे में:

1. जलीय आवास समाप्त होना।


2. बर्ड वाचिंग को प्रोत्साहन ना मिलना

3. स्थानीय प्रशासन की बेरुखी

4. जलीय क्षेत्रों में मानवीय दखल

5. वाटर फ्लो के पैटर्न में आए बदलाव से जलीय क्षेत्र सीमित होना।

यूं बचाया जा सकता है पक्षियों को:

- पक्षी क्षेत्रों के संरक्षण के लिए प्रशासन प्रयास करें।

- केन्द्र की कम्यूनिटी एंड कंजर्वेशन रिजर्व योजना की सूची में उदयपुर शामिल हो।

- प्रशासन, वन और पर्यटन विभाग मिलकर बर्ड वाचिंग को प्रोत्साहन देने की योजना बनाएं।

- पक्षी अवलोकन को एक आर्थिक गतिविधि के रूप में प्रोत्साहन दें।

- बर्ड वाचिंग के लिए गाइड तैयार करें। प्रशिक्षित लोगों को इस दिशा में जोड़ते हुए पहल करें, ताकि लोगों में पक्षियों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़े ।