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डाउनलोड करेंउदयपुर. भगवान को मन्दिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारे में खोजने से नहीं मिलेगा। जो खुद के पास है उसे खोजने की जरूरत नहीं होती। परमात्मा तो हमारी आत्मा में सदा ही विराजमान होता है। रविवार को शहर की सबसे बड़ी पॉश कॉलोनी सर्वऋतु विलास में मुनि प्रसन्न सागर महाराज श्रद्धालुओं से मुखातिब थे।
उन्होंने कहा कि परमात्मा को पहचानना ही इस देह मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा है। जीवन पृष्ठों पर कुछ ऐसा लिखा जाए जो पवित्र ग्रन्थों के पृष्ठों पर पढ़ा जाए।
मुनिश्री ने बताया कि आप भी यात्रा पर हो और संत भी यात्रा पर है, तुम्हारी यात्रा घर से श्मशान घाट पर जाकर समाप्त होती है और संत की यात्रा मन्दिर से मोक्ष पर जाकर खत्म होती है।
उनका कहना था कि बच्चों को नैतिकता और धार्मिकता के अच्छे संस्कार दें। बच्चे सिखाने से नहीं दिखाने से सीखते है। जैसा आचरण होगा, बच्चे भी वैसा ही करेंगे।
मुनि श्री प्रसन्न सागर ने कहा कि काम वासना से जिनका मन मलिन है, वे परमात्मा की सच्ची पूजा भक्ति नहीं कर सकते। मन की पवित्रता ही मुक्ति का द्वार खोलती है। भारतीय संस्कृति में चार पुरुषार्थों - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उल्लेख है। प्रारंभ में धर्म और अंत में मोक्ष पुरुषार्थ को रखा है।
यह क्रम अत्यन्त महत्व रखता हुआ संकेत देता है कि अर्थ पर धर्म का नियंत्रण और काम पर मोक्ष का नियंत्रण होना चाहिए। यदि धर्म और मोक्ष के मध्य अर्थ और काम तत्व प्रवाहित होते हैं, तब तो ठीक हैं, लेकिन जब अर्थ और काम तत्व, धर्म और मोक्ष की उपेक्षा और अवज्ञा करके स्वच्छंद होकर चलता है तो जीवन की साधना समाप्त हो जाती है।
Photo_Pankaj Vaishnav
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