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मनरेगा में अब अनिवार्य रूप से मिलेगा रोजगार - गुलाबचंद कटारिया

8 वर्ष पहले
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जयपुर। ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री श्री गुलाबचंद कटारिया ने शुक्रवार को विधानसभा में आश्वस्त किया कि मनरेगा के निर्धारित प्रपत्र में आवेदन करने पर सम्बन्धित को 15 दिन में आवश्यक रूप से रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। साथ ही कहा कि मनरेगा के कार्यों में निर्धारित 15 दिवस के भीतर मजदूरी का भुगतान न होने की स्थिति में सम्बन्धित अधिकारी पर जुर्माना लगाया जाएगा।


कटारिया ने प्रश्नकाल में विधायकों की ओर से इस सम्बन्ध में पूछे गए पूरक प्रश्नों के जवाब में कहा कि सरकार चाहती है कि श्रम की तुलना में सामग्री अंश को बढाया जाएगा, ताकि ज्यादा से ज्यादा पक्के काम हो सके। इसके लिए सासंद और विधायक कोष तथा निर्बन्ध राशि सहित अन्य निधियों के उपयोग का प्रस्ताव भिजवाया जाएगा।
उन्होंने वर्ष 2008-09 में मनरेगा के तहत 6175 करो$ड रुपए व्यय होने की तुलना में वर्ष 2013-14 में दिसम्बर तक 2039 करो$ड रुपए ही खर्च होने पर स्पष्ट किया कि पांच वर्ष पूर्व न्यूनतम मजदूरी और मनरेगा मजदूरी समान 73 रुपए थी, जबकि वर्तमान में न्यूनतम मजदूरी 165 रुपए है, जबकि मनरेगा में 149 रुपए है। इसके अतिरिक्त अब मस्टररोल एमआईएस से तैयार होता है, जिससे हर मनरेगा मजदूर के काम में पारदर्शिता आती है। उन्होंने कहा कि मनरेगा में मजदूरी 149 रुपए होने और बाजार में मिलने वाली मजदूरी बढकर 200-250 रुपए तक हो जाने तथा नियमों में कठोरता के कारण मजदूरों की संख्या घटी है। उन्होंने जानकारी दी कि इस वर्ष जनवरी तक 12 लाख लोगों को मनरेगा से जो$डा गया है और आने वाले समय में और लोगों को इससे जोडा जाएगा।


श्री कटारिया ने बताया कि महात्मा गांधी नरेगा अधिनियम, 2005 में यह स्पष्ट है कि न तो ठेकेदार के द्वारा काम करवाया जा सकता है और न ही बगैर निविदा आमंत्रित किए सामग्री की खरीद की जा सकती है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2012 से पहले जीएफआर नियमों के तहत सरपंचों को तीन हजार रुपए तक की खरीद करने का अधिकार था। लोक उपापन अधिनियम के आने के बाद वर्ष 2012 में यह सीमा दस हजार रुपए कर दी गई है। इसी प्रकार सीमित निविदाओं के मामले में क्रय समिति बनाकर सरपंच को पचास हजार रुपए तक की सामग्री खरीद करने का अधिकार दिया गया है। कोटेशन के द्वारा एक लाख रुपए तक तथा सीमित निविदा द्वारा दो लाख रुपए तक सामग्री खरीद की जा सकती है। दो लाख से अधिक की सामग्री खरीद के लिए खुली निविदा की प्रक्रिया अपनाया जाना आवाश्यक है।


कटारिया ने बताया कि क्रय समिति को एक वर्ष में बिना निविदाओं के तीन लाख रुपए तक के काम करवाने का अधिकार दिया गया है। साथ ही स्थानीय फर्मों से कोटेशन लेकर पांच लाख रुपए तक के, सीमित निविदा के माध्यम से दस लाख रुपए तक तथा खुली निविदा प्रक्रिया के जरिए इससे अधिक राशि के कार्य करवाए जा सकते है।
ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री ने जानकारी दी कि सरपंच को एक वर्ष में दो लाख रुपए तक के कार्य करवाने का अधिकार है।
इससे पहले विधायक हमीरसिंह भायल के मूल प्रश्न के जवाब में कटारिया ने बताया कि प्रदेश में रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत रोजगार उपलब्ध करवाया जा रहा है। उन्होंने महात्मा गांधी नरेगा अधिनियम 2005 तथा राज्य सरकार द्वारा जारी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम, राजस्थान की प्रति सदन के पटल पर रखी।


कटारिया ने कहा कि सरकार मनरेगा के तहत कार्य हेतु निविदा प्रक्रिया के प्रावधानों के सरलीकरण हेतु बीएसआर दरों पर कार्य करवाने का प्रावधान करने का विचार नहीं रखती है। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी नरेगा अधिनियम 2005 की संशोधित अनुसूची प्रथम के बिन्दु संख्या 23 के अनुरूप ग्राम पंचायतों एवं कार्यकारी एजेन्सियों द्वारा राज्य सरकार द्वारा निर्दिष्ट पारदर्शी निविदा प्रक्रिया के अनुसार ही सामग्री का क्रय किया जा सकता है। राज्य सरकार द्वारा राजस्थान में लोक उपापन में पारदर्शिता अधिनियम 2012 तथा राजस्थान में लोक उपापन में पारदर्शिता नियम 2013 के द्वारा निविदा प्रक्रिया को पारदर्शी एवं सरलीकरण किया गया है, तदनुसार ही महात्मा गांधी नरेगा योजना में सामग्री का क्रय किया जा रहा है। महात्मा गांधी नरेगा अधिनियम 2005 की संशोधित