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पहले कहते थे मेरे पास मां है

8 वर्ष पहले
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रांची/जमशेदपुर। टाटा मेन हॉस्पिटल (टीएमएच) के मनोचिकित्सक डॉ संजय अग्रवाल ने कहा कि हमारे मूल्यों में काफी बदलाव आया है। इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि 40 साल पहले हम कहते थे-मेरे पास मां है। अब कहते हैं-मेरे पास टीवी, फ्रीज और गर्लफ्रेंड्स हैं। डॉ अग्रवाल बुधवार को एक्सएलआरआई की संस्था सामर्थ्य की ओर से आयोजित फादर प्रभु हॉल में आयोजित कॉन्फ्रेंस रिफ्लेक्शंस-2014 में शहर के स्कूली छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि हमारी जिंदगी में तकनीक का वर्चस्व बढ़ा है। हम स्वीट्जरलैंड में बैठे फ्रेंड्स को तो जानते हैं, लेकिन अपने पड़ोसी की जानकारी नहीं रखते। अब फ्रेंडशिप रियल की बजाय, ऑनलाइन ज्यादा हो गया है। डॉ अग्रवाल ने कहा कि कोई भी तकनीक खराब नहीं होती। हम उसका इस्तेमाल कैसे करते हैं, यह महत्वपूर्ण होता है।

सपने हमारे हैं, तो चश्मा तुम्हारा क्यों लगाऊं

डॉ अग्रवाल ने कहा कि आज के बच्चे अपनी जिंदगी को अपनी इच्छानुसार जीना चाहते हैं। उन्होंने युवाओं के हवाले से एक कविता का उल्लेख किया-सपने हमारे हैं, तो चश्मा तुम्हारा क्यों लगाऊं। अपनी क्लिनिक में आने वाले प्रॉब्लम की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि अधिकतर यंगस्टर की शिकायत होती है कि पैरेंट्स उन्हें समझने की कोशिश नहीं करते, जबकि पैरेंट्स कहते हैं कि बच्चा उनकी बात सुनना नहीं चाहता।

आगे पढ़ें, पैरेंट्स की भी हो काउंसलिंग...