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डाउनलोड करेंरांची/कालिकापुर. स्वाधीनता की लड़ाई लडऩे वाले रणबाकुंरों को शाबाशी देने नेताजी सुभाष चंद्र बोस 5 दिसंबर, 1939 को जब कालिकापुर पहुंचे थे, तब उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस कुर्सी पर वह बैठ रहे हैं वह भविष्य में विवाद का कारण बन जाएगा। झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले में स्थित इस गांव में नेताजी द्वारा उपयोग की गई कुर्सी, टेबल, टेबल क्लाथ और बैठक करते उनकी तस्वीर अब भी मौजूद है। यहां के लोग उनकी यादों को आज भी संजो कर रखे हुए हैं, लेकिन आज यही धरोहर दो परिवारों के बीच विवाद का कारण बन गया है।
यहां के डॉ. विकास चंद्र भकत और कुमुद रंजन भकत के घर में एक सी कुर्सी और टेबुल-तस्वीर मौजूद है। दोनो ही उसके असली होने का दावा करते हैं। नेताजी की तस्वीर में दिखाई दे रही कुर्सी और टेबुल क्लाथ दोनो के घर में रखी कुर्सियों और टेबुल क्लाथ से मेल खाती है। ऐसे में नेताजी किसकी कुर्सी पर बैठे थे, इसका सही पता लगाना आम लोगों के लिए मुश्किल हो गया है। नेताजी की जयंती के दिन कुर्सी, टेबुल और तस्वीर की प्रदर्शनी लगाई जाती है। उसके बाद सालभर यह धरोहर संभाल कर रख दिया जाता है। असली-नकली के विवाद से दूर लोग आज भी इन्हें देखने पहुंचते हैं और बच्चों को दिखाकर गौरव महसूस करते हैं कि उनकी धरती पर कभी महान स्वतंत्रा सेनानी नेताजी के कदम पड़े थे।
आगे विस्तार से पढ़िए नेताजी कैसे पहुंचे थे कलिकापुर और देखिए अन्य धरोहरों की तस्वीरें...
फोटो- विजय कुमार
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