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ठगे रह गए निर्दलीय, पहली बार राज्यसभा चुनाव में नहीं मिला भाव

7 वर्ष पहले
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रांची। झारखंड गठन के बाद अब तक हुए राज्यसभा चुनाव में पहली दफा निर्दलीयों को भाव नहीं मिला। निर्दलीय आखिर ठगे- के ठगे ही रह गए। सभी को आस थी कि अंतिम समय में निर्दलीयों की भूमिका अहम होगी, जैसा अब तक झारखंड की राजनीति में होता आया है। मगर स्थापित दलों के रणनीति के आगे उनकी एक न चली और अंतत: बैठे के बैठे ही रह गए। चाहे वह निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवाणी हो या फिर राजद के प्रेमचंद गुप्ता।

इस बार नाथवाणी ने भाजपा के केंद्रीय नेताओं व आजसू के सुप्रीमो सुदेश महतो को अपनी गिर फत में लिया और बाजी मार ली। वहीं प्रेमचंद गुप्ता की ओर से मोर्चा संभाले खुद पार्टी सुप्रीमो लालू यादव झारखंड में जोड़-घटाव करने के बजाए सीधे कांग्रेस आलाकमान को विश्वास हासिल करने में सफल रहे और राजद बाजी मार लिया। झारखंड गठन के बाद पहली बार राजद केवल पांच विधायकों के बल पर अपने प्रत्याशी को राज्यसभा भेजने में सफल रहा है।

ऐसे में झारखंड के निर्दलीय व छोटे दल के एक-एक विधायक को किसी ने भाव नहीं दिया। झाजमं विधायक बंधु तिर्की, झापा विधायक एनोस एक्का, मासस विधायक अरूप चटर्जी, निर्दलीय विधायक विदेश सिंह, चमरा लिंडा, गीता कोड़ा, हरिनारायण राय आदि को न तो वोट देने की जरूरत पड़ी और न ही किसी ने संपर्क किया। इस तरह झारखंड गठन के बाद पहली बार निर्दलीय ठगे के ठगे ही रह गए।