फोटो - जीविका में नि:शक्त बच्चों को प्रशिक्षण देते अवतार सिंह सुखदीप कौर।
रांची/जमशेदपुर। मानसिकरूप से कमजोर (नि:शक्त) बच्चों को आमतौर पर समाज में उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। इन बच्चों के प्रति ज्यादातर लोग मन में यह अवधारणा पाल लेते हैं कि ये बेकार हैं, इनसे कुछ होगा नहीं। लेकिन इन्हीं बच्चों के जीवन में रंग भरने और उन्हें सबल बनाने का बीड़ा उठाया है पूर्व अंतरराष्ट्रीय साइकिलिस्ट अवतार सिंह ने। इस नेक कार्य में अवतार सिंह की पत्नी सुखदीप कौर भी उनका कदम दर कदम साथ निभा रही हैं।
अवतार ऐसे बच्चों की मदद के लिए जीविका नामक संस्था चलाते हैं। संस्था के माध्यम से बच्चों को सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा दी जाती है। इसके बाद उन्हें रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण दिया जाता है। ताकि ये बच्चे आत्मनिर्भर होकर अपने को सबल बनाने के साथ समाज में अपनी अलग पहचान बना सकें। इस क्षेत्र में बेहतर सेवा के लिए बिहार की एक संस्था अवतार सिंह को डॉ राजेंद्र प्रसाद सेवा सम्मान से सम्मानित कर चुकी है। अवतार सिंह नेशनल साइकिलिंग चैंपियनशिप का सात बार खिताब जीत चुके हैं। उन्होंने 1978 में कनाडा में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स और 1982 में दिल्ली में आयोजित एशियन गेम्स में भारतीय साइकिलिंग टीम का नेतृत्व भी किया है।
सामान्य खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण देना नहीं भाया
खेल से संन्यास लेने के बाद अवतार सिंह ने पटियाला कोचिंग प्रशिक्षण केंद्र से प्रशिक्षण लिया। इसके बाद वे साइकिलिंग की राज्य टीम और नेशनल टीम के खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण देने में जुट गए। उन्होंने कहा, "पर जल्द ही मुझे ऐसा लगा कि जो खिलाड़ी हैं, उनकी इच्छाएं बहुत ज्यादा हैं, लेकिन वे इच्छानुसार मेहनत नहीं करना चाहते। इस लिए मैंने सामान्य खिलाडिय़ों को कोचिंग देना बंद कर दिया।" टाटा मोटर्स में काम करते हुए अवतार ने आशा किरण और स्टार्ट नामक संस्था से जुड़े मानसिक रूप से नि: शक्त बच्चों को प्रशिक्षण देना आरंभ किया। इसका काफी अच्छा परिणाम निकला। यहां के बच्चों ने राज्य और देश स्तर पर ही नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर आयोजित स्पेशल गेम्स में बेहतर प्रदर्शन कर देश का नाम रोशन किया। इस सफलता के बाद से उनमें इन बच्चों के लिए काम करने का जज्बा जाग गया। अवतार से प्रभावित होकर उनकी शिक्षिका पत्नी सुखदीप कौर भी नौकरी छोड़ उनकी संस्था में हाथ बंटाने लगीं।
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फोटो - मुकेश ठाकुर।