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जीएसएलवी एमके-३ प्रक्षेपण अगले सप्ताह : पद्मश्री माधवन
बीआईटी मेसरा में है देश का पहला स्पेस और रॉकेट्री डिपार्टमेंट
भास्कर संवाददाता, रांची
प्रिय स्टूडेंट्स, मेरे लिए यह स्मरणीय क्षण है। हमारे करियर निर्माण में बीआईटी मेसरा की संस्थान की अहम भूमिका रही है। यहां के स्टूडेंट्स के साथ मेरा भावनात्मक संबंध है। क्योंकि मैं यहां के स्पेस एंड रॉकेट्री डिपार्टमेंट में सत्र १९८४- ८५ से पीजी किया हूं। उस समय में इसरो में जुड़ा हुआ था। दीक्षांत समारोह को संबोधित करना हमारे लिए हर्ष की बात है। मुझे बताते हुए खुशी हो रही है कि देश कहा पहला इंजीनयिरिंग और रॉक्रेट्री डिपार्टमेंट बीआईटी में शुरू हुआ। ३० साल पहले इस कैंपस के प्रोफेसर के साथ जो रिश्ते बने, उसे मैं संजोकर रखा हूं। बीआईटी पिछले ५० सालों से लोगों के जीवन में बदलाव लाने के लिए प्रयासरत है।
यह बताते हुए हमें गर्व हो रहा है। जीएसएलवी एमके-३ श्रीहरिकोटा से दिसंबर माह के अगले सप्ताह प्रक्षेपित होने वाला है। यह भी सच्चाई है कि देश का पहला रॉकेट १९६४ में लांच हुआ, उस समय स्पेस साइंस टेक्नोलॉजी टेक्नोलॉजी में इंडिया काफी नीचे था। टेक्नोलॉजी के विकास के लिए व्यक्ति से अधिक संगठन और टीम वर्क अहम होता है। क्योंकि संगठन उत्प्रेरक के रुप में कार्य करते हैं।
स्पेस टेक्नोलॉजी के पेचीदा और जटिल पहलुओं को समाज कल्याण के लिए इसरो ने सुलझाया है। इस दिशा में इसरो ने संसार के रोल मॉडल के रूप में कार्य किया है। लेकिन अभी भी स्पेस स्पेस टेक्नोलॉजी में आत्म निर्भरता हमारे देश के लिए अहम सवाल है। इसके बाद भी ६० के दशक का इंडियन स्पेस प्रोग्राम शुरुआती दौर से गुजरते हुए लंबा रास्ता सफल किया है। इसमें बहुत ही परिश्रम से आत्म निर्भरता देश के हाई टेक्नोलॉजी में बतौर मिशन के रुप में डेवलप किया है।
वर्तमान समय में पूरे विश्व में स्पेश रिसर्च और स्पेस क्राफ्ट लांच करने के क्षेत्र में अपार संभावनाएं है। इसमें हमारा देश बेहतर कार्य कर रहा है। मैं संक्षेप में यह कहना चाहूंगा कि विगत वर्षों में इसरो एक टीम के रुप में देशहित में कार्य कर रहा है। हमारे देश के तिरुअनंतपुरम के थंबा में २४ नवंबर १९६८ को यूएस की मदद से पहला रॉकेट लांच हुआ था। इसके बाद एएलवी-३, एएसएलवी समेत अन्य सैटेलाइट के माध्यम से व्हीकल के माध्यम से रॉकेट लांच किए गए हैं। इसमें चंद्रयान व मास भी शामिल है।
देश की टेक्नोलॉजी ने विदेशों में भी अलग पहचान बनाई है। फ्रांस, इटली, जर्मनी, कनाडा, कोरिया, सिंगापुर समेत अन्य देशों के लिए छोटा लांचिंग सैटेलाइट तैयार किया है। इसी प्रकार जल के क्षेत्र में रिमोट सोर्सिंग और संचार जैसे उच्च स्तरीय सैटेलाइट भी शामिल है।
अंत में मैं छात्रों को संदेश देना चाहूंगा कि हममें से कोई बेकार नहीं है। हमारे अंदर जितनी संभावनाएं हैं, उसका कुछ अंश ही हम प्रयोग कर पाते हैं। इसके लिए जरुरी है कि किसी भी कार्य को बेहतर ढंग से करने का प्रयास हमेशा जारी रखें। ऐसा कर पाते हैं तो सफलता हमारी होगी। स्वामी विवेकानंद की उस उक्ति को स्मरण दिलाना चाहता हूं, जिसमें उन्होंने कहा था कि संसार मं जितना भी ज्ञान हासिल किया गया है, वह मस्तिष्क से आता है और मस्तिष्क ही ब्रह्मांड का अनंत पुस्तकालय है। इसलिए मैं कहना चाहूंगा कि एनर्जी से भरे दिमाग का उपयोग करें।
(पद्मश्री माधवन चंद्र दत्तन बी)