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डाउनलोड करेंजोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक युवक द्वारा गलत तरीके से अपने अधिवक्ता के माध्यम से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पेश करने पर यह कहते हुए नाराजगी जताई कि याचिकाकर्ता ने बिना तथ्यों को भली भांति जांचे परखे अदालत को गुमराह करने का प्रयास किया है। इसके लिए अदालत ने हालांकि याचिकाकर्ता को दंडित करना लाजमी बताया लेकिन उसके छात्र जीवन तथा कमजोर तबके से होने के कारण उसके खिलाफ किसी तरह की कार्यवाही करने से खुद को रोका है।
वरिष्ठ न्यायधीश गोविंद माथुर व न्यायाधीश बनवारी लाल शर्मा की खंडपीठ में सिरोही जिले के मंडार कस्बे के निवासी शिवकुमार सरगरा ने अधिवक्ता मनीष व्यास के माध्यम से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पेश करते हुए कहा था कि उसकी सहपाठी रही एक युवती के साथ उसके प्रेम संबंध है तथा वह उसके साथ शादी करना चाहता है, लेकिन उसके परिजनों ने उसे बंदी बनाया हुआ है। इस पर खंडपीठ ने 10 मई को बंदी युवती को पेश करने के आदेश दिए थे।
शुक्रवार को सरकारी अधिवक्ता बरकत खां मेहर के माध्यम से सिरोही जिला पुलिस ने युवती को पेश किया जिसने अदालत को बताया कि सहपाठी होने के नाते उस युवक से दोस्ती भर थी। उसे किसी ने भी बंदी नहीं बनाया है तथा वह आगे भी अपने मां बाप के साथ ही रहेगी।
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