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Dainik Bhaskar

Sep 17, 2015, 01:55 PM IST
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नई दिल्ली। क्या किसी फिल्म में होमोसेक्सुएलिटी को दिखाना एक समाज की बुराई को दिखाने के बराबर है। एक अंग्रेजी बेवसाइट में छपी खबर के मुताबिक यह सवाल सुप्रीम कोर्ट के सामने आया है जो कि गुजरात सरकार के एक फैसले पर सुनवाई कर रहा है। इस फैसले के तहत सरकार ने एक फिल्म को टैक्स में छूट देने से मना कर दिया है, यह फिल्म होमोसैक्सुअल लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को दर्शाती है।
गुजराती फिल्मों को मिलती है टैक्स में छूट
स्टेट लॉ के अंतर्गत इस तरह की टैक्स रिलीफ 1 अप्रैल 1997 के बाद बनी गुजराती फिल्मों को दी जाती है लेकिन बुरी रूढ़ियों, अंध विश्वास, सती, दहेज और दूसरी सामाजिक बुराईयों को दर्शाने वाली फिल्में या फिर वो फिल्में जो राष्ट्रीय एकता के खिलाफ हो उनको यह छूट नहीं दी जाती है।
मेगधानूशया को छूट देने से राज्य सरकार इनकार
गुजरात सरकार ने 2013 की फिल्म ‘मेगधानूशया-द कलर ऑफ लाइफ(Meghdhanushya – The Colour of Life)’ को टैक्स में छूट देने से इनकार कर दिया था। सरकार का तर्क था कि यह फिल्म कानून में बताए गए अपवादों के तहत आती है क्योंकि यह होमो सेक्सुएलिटी जैसे कंट्रोवर्शियली सबजेक्ट के आस-पास घूमती है। सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया गया कि सेंसर ने फिल्म को एडल्ट सर्टिफिकेट दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने बहाल कर दिया था 1861 का कानून
सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में औपनिवेशिक युग के एक कानून को बहाल कर दिया था जो कि गे सेक्स को देश में रोकता था और विधायी परिवर्तन करने के लिए इसे संसद पर छोड़ दिया था। इस फैसले ने मानवाधिकार समूह को हैरान कर दिया था।
1861 के कानून के तहत आदमी, औरत या जानवर के साथ अप्राकृतिक कामुक संभोग करने पर दस साल की सजा का प्रावधान है। दिल्ली हाई कोर्ट ने 2009 में इसे असंवैधानिक करार दे दिया था। रूढ़िवादी संगठनों ने इसका विरोध किया और कुछ ने होमो सेक्सुएलिटी को बीमारी भी बताया जो जिसका इलाज किया जा सकता है।
गे कम्युनिटी को पॉजिटिव रूप में दर्शाने वाली पहली गुजराती फिल्म
मेगधानूश्या को गुजराती सिनेमा की पहली फिल्म माना जाता है जिसमें गे कम्युनिटी को पॉजिटिव रूप में पेश किया गया है। इस फिल्म को ऑस्कर में भारत की एंट्री के तौर पर चुना गया था। फिल्म में एक ऐसे युवक की कहना है जो कि सेम सेक्स के लोगों की तरफ आकृषित होता है। यह फिल्म उन सिचुएशन को दर्शती है जिनका उन्हें सामना करना पड़ता है।
हाईकोर्ट ने कहा फिल्म को टैक्स में छूट दी जाए
फिल्म के डायरेक्टर किरन कुमार रमेशभाई देवमनी की ओर से दायर याचिका पर गुजरात हाईकोर्ट ने फरवरी 28, 2014 में राज्य सरकार को यह निर्देश दिया था कि वह फिल्म को जरूरी टैक्स छूट दे। राज्य सरकार ने तुरंत इस ऑर्डर को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया और एक स्टे हासिल किया। जस्टिस ए.आर.दवे इस मसले पर सुनवाई के लिए तैयार हो गई।
सरकार की दलील
सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी अपील में राज्य सरकार ने कहा कि फिल्म एक कंट्रोवर्सिशयल सबजेक्ट के इर्दगिर्द घूमती है और इसे सेंसर बोर्ड द्वारा एडल्ट सर्टिफिकेट दिया गया है। राज्य सरकार ने कहा कि यह फिल्म अपवाद श्रेणी में आती है।
गे या होमो सेक्सुअल जैसे डायलॉग हटाने को कहा गया
गुजरात के कमिश्नर ऑफ एंटरटेनमेंट टैक्स ने जब दो बार फिल्म को टैक्स में छूट देने से मना कर दिया तो फिल्म के निर्देशक ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। फिल्म निर्देशक से पहले तो फिल्म से होमो सेक्सुअल या गे जैसे डायलोग को हटाने और इन शब्दों को इंगलिश सब टाइटल्स से भी हटाने के लिए भी कहा गया। फिल्म डायरेक्टर ने जब इसे हटाने से मना कर दिया है कमिश्नर ने उसकी मांग खारिज कर दी। दूसरी बार कहा कि फिल्म की स्टोरीलाइन मंजूर नहीं की जा सकती न सिर्फ गुजरात में बल्कि पूरे देश और विश्व में।
किरन कुमार ने दलील दी कि उनकी फिल्म गे लोगों को समाज द्वारा उपहास उड़ाने से पैदा हुई परेशानियों को दर्शाती है। हाईकोर्ट ने कुमार की याचिका को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि टैक्स में छूट न देना याचिकाकर्ता के राइट टू फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन को सीमित करता है।
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