(फाइल फोटो: प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल)
नई दिल्ली। मोदी सरकार में खाद्य मंत्री रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति (लोजपा) के महासचिव अब्दुल खालिक ने भाजपा नेताओं के 'मुस्लिम विरोधी नजरिये' के खिलाफ खुले आम आवाज उठाई है। 330 से ज्यादा सदस्यों वाले सत्ताधारी एनडीए में लोजपा के छह सदस्य हैं। खालिक के रूप में एनडीए की ओर से पहली बार भाजपा नेताओं के भड़काऊ बयानों के खिलाफ आवाज उठी है। राजनीति में आने से पहले नौकरशाह रहे खालिक ने प्रधानमंत्री के बयान ( भारतीय मुसलमान देश के लिए जी भी सकते हैं और मर भी सकते हैं) पर भी निशाना साधा है। उन्होंने साफ कहा है कि जो कभी शाखाओं और दक्षिणपंथी कट्टरवादियों के बयान थे, वे मुख्यधारा के संवाद का हिस्सा बन चुके हैं। अंग्रेजी अखबार 'इंडियनय एक्सप्रेस' में लिखे लेख में खालिक ने नेताओं के अलावा न्यायपालिका, मीडिया व समाज के अन्य वर्गों पर भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने मीडिया पर आरोप लगाया है कि वह तार्
किक आवाज को जगह नहीं देकर महंत आदित्यनाथ, साक्षी महाराज जैसे नेताओं के बयानों को ज्यादा कवरेज देता है।
खालिक का पूरा लेख इस प्रकार है:
यूपी-बिहार में हुए उप-चुनाव के परिणाम को राष्ट्र में धर्मनिरपेक्षता की गहरी जड़ों और देश की सेकुलर साख के प्रमाण के तौर देखा जा रहा है। धर्मनिरपेक्ष भक्तों के लिए प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी का बयान, ‘भारतीय मुसलमान देश के लिए जी भी सकते हैं और मर भी सकते हैं,’एक खुशी की बात है। हालांकि पीएम को मुस्लिमों की देशभक्ति को रेखांकित करना जरूरी लगा, लेकिन यह अपने आप में एक परेशान करने वाला बयान है। इस बयान में यह डरावनी सच्चाई अंतरनिहित है कि आज भारत में मुस्लिमों को किस तरह से देखा जाता है। मैं एक भारतीय हूं, लेकिन इसके साथ ही यह सच कि मैं एक मुसलमान हूं, मेरे देशभक्ति के दावे को संकटग्रस्त बना देता है। मैं यह इसलिए नहीं कह रहा कि हमारे कानून श्रेष्ठ हैं, मैं यह कह रहा हूं क्योंकि दिमाग को सुन्न कर देने वाला दुश्मनी का माहौल और पूर्वाग्रह, अविश्वास और मुस्लिमों के लिए नफरत बढ़ी है।
यद्यपि मुसलमान सामाजिक-आर्थिक सीढ़ी के निचले पायदान पर हैं, और ह्यूमैन डेवलपमेंट इंडेक्स में हर मामले में दलितों के बराबर हैं। देश में सार्वजनिक बहस मुसलमानों के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन को लेकर नहीं होती। आम मुसलमान की हालत लगातार बदतर होती जा रही है। समाज के हाशिए पर खड़ा मुसलमान शिक्षा, नौकरी और घर ढूंढने में हालात अपने खिलाफ पाता है। उसे आतंकवादियों के साथ मौन साठगांठ के कलंक का भार भी ढोना पड़ता है। अब तक मुस्लिमों के साथ भेदभाव और उनके प्रति अविश्वास छुपे हुए थे लेकिन अब सब कुछ सतह पर आ गया है।
पहली बार मुस्लिमों को न सिर्फ ‘अलग’ के तौर पर देखा जा रहा है बल्कि उन्हें देश की समस्याओं की बुनियादी वजह के तौर पर भी देखा जाने लगा है। सबसे खतरनाक झूठ को सबसे ज्यादा प्रचारित किया गया, जैसे कि ‘
लव जिहाद’ यानी हिंदू लड़कियों का जबरदस्ती
धर्म परिवर्तन, जनसंख्या अनुपात को बिगाड़ना, किसी का मुस्लिम धर्म में हुआ परिवर्तन मतलब हिंदूओं का एक शत्रु बढ़ जाना, 90 प्रतिशत बलात्कार मुस्लिमों द्वारा किए जाते हैं, मुस्लिम दंगे भड़काते हैं, जिन इलाकों में मुस्लिमों की 35 प्रतिशत आबादी है वहां किसी गैर मुस्लिम के लिए कोई जगह न होना। अविश्वास और नफरत की सड़ांध समुदाय के ऊपर काले बादलों की तरह छाई हुई है।
आज प्रवीण तोगड़िया पुराने पड़ चुके हैं। जो कभी शाखाओं और दक्षिणपंथी कट्टरवादियों के बयान थे, वे मुख्यधारा के संवाद का हिस्सा बन चुके हैं। सबसे विभाजनकारी और भड़काऊ भाषणबाजी अब आम हो गई है। सांसद साक्षी महाराज ने सार्वजिनक मंच का इस्तेमाल यह आरोप लगाने के लिए किया कि पूरे देश में मदरसे आतंक और लव जिहाद की शिक्षा फैला रहे हैं।
केंद्रीय मंत्री और पशु प्रेमी मेनका गांधी को भी यह कहने में कोई हिचक नहीं हुई कि गाय को मार कर कमाने वाला पैसा आतंकवाद की मदद के लिए प्रयोग होता है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी इस्लाम और मुस्लिमों को लेकर अपने जहरीली राय जाहिर करते हैं।
एक ऐसे समय में जब हिंदू बहुसंख्यकवाद का खतरा है तो सुप्रीम कोर्ट के एक जज खुलेआम यह कहते हैं कि अगर वह तानाशाह बने तो स्कूलों में गीता और महाभारत पढ़वाने को कह देंगे। यह सोच कोई अपवाद नहीं है बल्कि हमारे समाज में रोज उठने वाले मुद्दे हैं।
इस अन्यायपूर्ण वातावरण में कथित तौर पर धर्मनिरपेक्ष कही जाने वाली पार्टियां भी जाति और समुदाय की राजनीति करने में लगी हैं। ऐसे में फाली नरीमन, राजमोहन गांधी और मेघनाथ देसाई जैसी आवाजों ने अल्पसंख्यक विरोधी कट्टरता और जनता में लगातार फैलाई जा रही नफरत और सरकार की चुप्पी को लेकर आगाह किया है।
नरीमन ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक कमीशन फोरम में बोलते हुए कमीश्न से आह्वान किया था कि वह कानूनी शिकायतें दर्ज कर अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करें।
यह दुखद है कि ऐसे प्रबुद्ध लोगों की राय ब्रेकिंग न्यूज नहीं मानी जाती। जबकि योगी आदित्यनाथ की नफरत से भरपूर बयान सुर्खियां बन जाते हैं। मीडिया के इस एकतरफा फोकस के चलते हर कोई जान जाता है कि योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा, जबकि तर्कसंगत आवाजों को मौन कर दिया जाता है। यह मीडिया के आत्मविश्लेषण का समय कि वह सोचे कि राष्ट्र के लिए जो मुद्दे खरतनाक हैं उन्हें कैसे पेश करे।
उल्लेखनीय है कि जो विभिन्न समुदायों के बीच नफरत और मुस्लिमों को अलग-थलग करने का काम कर रहे हैं वह दरअसल अलगाववादी और राज्य के दूसरे दुश्मनों को ही फायदा पहुंचा रहे हैं। यह सोचना उतावलापन है कि देश 15 करोड़ लोगों को अलग रख कर प्रगति कर सकता है।
हमारे प्रधानमंत्री ने नारा दिया है ‘सबका साथ-सबका विकास’ इस नारे को सच्चाई में बदलने की जरूरत है, नहीं तो हम डूब जाएंगे।