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7 वर्ष पहले
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(फाइल फोटो : प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल )
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट (अमेंडमेंट) बिल को संसद के मौजूदा सत्र में पेश करने की मांग कर रहे जिला अदालत के वकीलों ने आज सरकार के आश्वासन के बाद भूख हड़ताल को टाल दिया है। दो दिन पहले 14 दिसंबर को शुरू की गई इस हड़ताल को अब वकील जारी नहीं रखेंगे। केंद्रीय कानून मंत्री सदानंद गौड़ा की ओर से संबंधित बिल को पास कराने के आश्वासन के बाद दिल्ली बार काउंसिल समेत अन्य संघों ने हड़ताल को जारी नहीं रखने का फैसला लिया है।
कानून मंत्री की ओर से वकीलों को आश्वासन दिया गया है कि बिल को संसद में पास कराने की उनकी मांग को पूरा किया जाएगा। इसके लिए वह जल्द से जल्द संबंधित विधेयक को संसद में पेश कर पास कराने का प्रयास करेंगे। वकीलों की हड़ताल खत्म होना दिल्ली के लोगों के लिए बड़ी राहत की खबर है, क्योंकि हड़ताल के चलते लोगों को वकील मिलने में बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। शनिवार को शुरू हुई इस भूख हड़ताल में बार एसोसिएशन्स के प्रमुखों समेत दिल्ली हाईकोर्ट बार असोसिएशन के प्रेजिडेंट राजीव खोसला भी शामिल हुए थे। जिला अदालतों की बार असोसिएशन्स की को-ऑर्डिनेशन कमिटी ने अब इस मुद्दे को लेकर संसद जाने की तैयारी की थी। याद रहे कि 14 दिसंबर को तीस हजारी कोर्ट के बाहर करीब 30 वकील भूख हड़ताल पर बैठे और उनको समर्थन देने के लिए सभी जिला अदालतों के वकील शामिल हुए।
वकीलों की को-ऑर्डिनेशन समिति के सचिव संजीव ने कहा कि आज वकीलों का एक प्रतिनिधिमंडल कानून मंत्री से मिला था और उस बैठक के दौरान पूर्व कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद भी मौजूद थे। बैठक के बाद सरकार की ओर से यह आश्वासन मिला है कि आने वाले गुरूवार को बिल टेबल किया जाएगा। इसी के चलते हमने अपनी हड़ताल को फिलहाल स्थगित कर दिया है।
याद रहे कि कानून मंत्री के आश्वासन से पहले वकीलों ने तय किया था मंगलवार को सभी जिला अदालतों के वकील पटियाला हाउस कोर्ट में जमा होंगे। वहां से वकीलों का जत्था संसद की तरफ जाना था। संसद की स्थायी समित दिल्ली हाईकोर्ट (अमेंडमेंट) बिल को पास कर चुकी है। इसी के चलते वकीलों की ओर से बिल को जल्द संसद में पेश किए जाने की मांग की जा रही है।
गौरतलब है कि दिल्ली हाईकोर्ट की फुल बेंच ने 21 नवंबर, 2012 में एक प्रस्ताव पास कर केंद्र सरकार से जिला अदालतों का सिविल मामलों में आर्थिक अधिकार क्षेत्र की सीमा 20 लाख से बढ़ाकर 2 करोड़ रुपए करने की सिफारिश की थी। यह सिफारिश हाई कोर्ट से पेंडिंग मामलों का बोझ कम करने और मौजूदा समय में प्रॉपर्टी की कीमतों को देखते हुए की गई।