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6 वर्ष पहले
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नई दिल्ली/पटना। बिहार में राजनीतिक संकट के बीच पश्चिम बंगाल से प्रभारी राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी पटना पहुंच चुके हैं। इस बीच जेडीयू के बिहार प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने राज्यपाल को जेडीयू, आरजेडी, कांग्रेस, सीपीआई और एक निर्दलीय विधायक के समर्थन का पत्र सौंपकर दावा किया कि नीतीश कुमार के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन है।
बिहार विधानसभा के स्पीकर उदय नारायण चौधरी ने भी नीतीश कुमार को जेडीयू विधायक दल के नेता के तौर पर मान्यता दे दी है। ऐसे में राज्यपाल के सामने अब क्या ऑप्शन्स हैं इस पर एक नजर डालते हैं।
क्या होगा अगर जीतन राम मांझी गर्वनर से सदन भंग की मांग करे ?
मांझी को शनिवार को केवल सात मंत्रियों द्वारा सदन भंग करने की सिफारिश करने के लिए अधिकृत किया गया। अगर मांझी अब भी सदन भंग करने की मांग करते हैं तो गर्वनर इसे मानने के लिए बाध्य नहीं होंगे। गर्वनर केसरीनाथ त्रिपाठी यह देखेंगे कि इस सिफारिश के पीछे कैबिनेट का पूरा समर्थन है कि नहीं। कानूनी जानकारों के मुताबिक इन परिस्थितियों में गर्वनर सीएम से अपनी सिफारिश पर फिर से गौर करने और सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए कह सकते हैं।
नीतीश को विधायक दल का नया नेता चुने जाने और नए दावे के क्या हैं मायने ?
अब जबकि बिहार विधानसभा के स्पीकर उदय नारायण चौधरी ने भी नीतीश कुमार को जेडीयू विधायक दल के नेता के तौर पर मान्यता दे दी है और जेडीयू और उसके सहयोगियों ने राजभवन को समर्थन का पत्र सौंप दिया है। गर्वनर या तो पहले मांझी के इस्तीफे का इंतजार कर सकते हैं या फिर उन्हें सदन में बहुमत साबित करने के लिए कह सकते हैं। मांझी अगर सदन में बहुमत हासिल नहीं कर पाते तो नीतीश को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया जा सकता है। नीतीश के पास 127 विधायकों का समर्थन है जबकि उन्हें 117 विधायकों के समर्थन की जरूरत है।
क्या होगा अगर बीजेपी की मदद से मांझी 117 के आंकड़े तक पहुंच जाते हैं?
गवर्नर दलबदल विरोधी कानून के तहत यह देख सकते हैं कि क्या मांझी के पास नई पार्टी बनाने के लिए अपनी पार्टी के दो तिहाई सदस्यों का समर्थन है या नहीं। जेडीयू के 111 विधायकों में से नीतीश को 97 विधायकों का समर्थन प्राप्त है जबकि मांझी को सिर्फ 14 विधायकों का समर्थन प्राप्त है।
क्या गर्वनर राष्ट्रपति शासन लगा सकते हैं?
हालांकि यह गर्वनर पर है कि वह राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश केंद्र से करते हैं या नहीं लेकिन उन्हें यह भी ध्यान में रखना होगा कि नीतीश कुमार पहले ही यह दावा कर चुके हैं कि उनके पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या बल है। गर्वनर नीतीश से उनका समर्थन का दावा करने वाले विधायकों की परेड करवाने और जेडीयू और उसके सहयोगियों के समर्थन का लेटर लाने को कह सकते हैं। गर्वनर के सामने यह सवाल भी होगा कि बजट सत्र करीब ही है ऐसे में अगर राष्ट्रपति शासन लगता है तो राज्य का बजट संसद से पास करवाना होगा। राज्य में विधानसभा चुनाव होने में अभी भी 8 महीने बाकी हैं ऐसे में राज्यपाल राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने से बचना चाहेंगे।
क्या गर्वनर सदन भंग कर मांझी को कार्यवाहक सरकार चलाने के लिए कह सकते हैं ?
इस राह में सबसे बड़ी बाधा राज्य का बजट पास करवाना होगा इसलिए राज्यपाल यह कदम नहीं उठाना चाहेंगे।