नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा के ऐतिहासिक नतीजे कांग्रेस, बीजेपी, आम आदमी पार्टी, दिल्ली और देश की राजनीतिक के लिए क्या संकेत देते हैं। एक नजर इन संकेतों पर
आम आदमी पार्टी
शानदार वापसी ने आप को दिल्ली में बीजेपी के विकल्प के रूप में स्थापित किया। वोट शेयर में भी जबरदस्त बढ़ोतरी, 2013 में जहां 29.5 % वोट शेयर रहा वहीं 2015 में बढ़ कर 54% हो गया।
पार्टी सफलतापूर्वक ‘धरना पार्टी’ की छवि से मुक्त होकर ‘दिल्ली डायलॉग’ और ‘गर्वेनेंस’ की तरफ बढ़ गई। आप की स्वीप इस बात का भी इशारा करती है कि पार्टी ने फिर से उस मिडिल क्लास के कुछ वोट पाए हैं जिसने मई 2014 को मोदी को वोट दिया था।
पार्टी ने दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में पैठ बनाई।
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में बीजेपी को मात देने वाली पहली पार्टी बनी।
दलित और मुस्लिम वोटर्स की पहली पंसद बने। दिल्ली में 29 प्रतिशत दलित-मुस्लिम वोटर हैं। दिल्ली के गरीब जिनमें रिक्शाचालक, ऑटो ट्राइवर, ठेले वाले, और मजदूर तबके ने भी आप को चुना।
प्रचंड बहुमत ला सकता है घमंड।
आम आदमी पार्टी के लिए विधानसभा में कानून पास करवाना अब बेहद आसान है। लेकिन केंद्र आप के लिए अड़चन पैदा कर सकता है।
आप को काम करने के लिए केंद्र से मदद की जरूरत पड़ेगी। अपने गर्वनेंस एजेंडे पर काम करने को लिए केंद्र से लगातार कौशल के साथ बातचीत करनी होगी
राजनीतिक और विधायी अनुभव विधायकों के लिए मुश्किल खड़ा कर सकता है। छोटी गलती भी पार्टी की छवि को बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है।
भारतीय जनता पार्टी
पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक उसके साथ रहा। पार्टी को 32% वोट मिले जो कि 2013 विधानसभा चुनाव के मुकाबले सिर्फ 1 प्रतिशत कम है।
अगला बड़ा चुनाव साल के आखिर में बिहार में हैं। पार्टी के लिए पुर्नमूल्यांकन और अपने को फिर संगठित करने का समय।
बेदी की असफलता पार्टी में अंदरूनी बहसों को सतह पर ला सकती है।
जनता मोदी को केंद्र में और आप को दिल्ली में चाहती है।
ब्रांड मोदी को बड़ा झटका।
अमित शाह की सांगठनिक और चुनाव प्रबंधन पर उठे गंभीर सवाल।
दिल्ली में पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले बीजेपी का वोट शेयर 46% के मुकाबले14% गिरा।
दिल्ली इकाई में अंदरूनी कलह उजागर
कांग्रेस
मोदी-शाह की जोड़ी को भी हराया जा सकता है। कांग्रेस अपने समर्थकों को उत्साहित कर सकती है और पार्टी के पुनरुत्थान की शुरूआत कर सकती है।
दिल्ली के चुनाव ने दिखा दिया कि जनता परिवार, लेफ्ट और ममता ने एक साथ मिलकर बीजेपी का विरोध किया। गैर भाजपा दलों द्वारा कांग्रेस की जगह बीजेपी को मेन टारगेट बनाने पर वोटरों की सोच में भी बदलाव आ सकता है।
उस राज्य में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया जहां उसने 15 साल तक राज किया। पार्टी का वोट शेयर लगातार गिरा। 2013 में 25% 2014 में 15 % और 2015 में 10% तक वोट शेयर गिर गया।
एक बार फिर साबित हुआ कि
राहुल गांधी का नेतृत्व कांग्रेस को जीत नहीं दिलवा पा रहा
गरीबों और अल्पसंख्यकों की पसंदीदा पार्टी अब कांग्रेस नहीं रही
शहर की पसंद कांग्रेस नहीं है, खासकर युवाओ की वह पंसद नहीं है
दिल्ली ने देश को क्या बताया
ताकतवर और प्रभावी नेतृत्व मतदाताओं को आकृषित करता है
वोटरों को पॉजिटिव एजेंडा पसंद है। मोदी 2014 में विकास के मुद्दे पर जीते,
केजरीवाल ने 2015 में दिल्ली के लिए एक विजन पेश किया और जीत हासिल की। आप ने 2014 में एंटी बीजेपी कैंपने चलाया और उसे हार मिली जबकि 2015 में बीजेपी ने एंटी-केजरीवाल एजेंडा चलाया और हार का सामना करना पड़ा
दिल्ली चुनाव ने दिखाया कि शहर की वह नई राजनीति जो कि जाति, धर्म, संप्रदाय से परे जाकर राजनीतिक और गर्वनेंस के मुद्दों पर की जाती है, फायदेमंद हो सकती है। आप ने पुरानी ढर्रे की राजनीति को छोड़ कर नई तरह की राजनीति की है लेकिन शेष भारत में इसे दोहराना इतना आसान भी नहीं है।
कांग्रेस नेतृत्व पार्टी के पतन को नहीं रोक सका है, आप दिल्ली में इसकी जगह ले सकती है।
2014 के ट्रेंड जारी हैं, कांग्रेस नहीं बीजेपी भारतीय राजनीति का है। विरोधी दलों को अब बीजेपी के खिलाफ एकजुट होना होगा