(106 साल के उस्ताद अब्दुल राशिद खान)
चंडीगढ़। "स्टेज पर चढ़ता हूं तो कोई चेहरा नजर नहीं आता, बस जैसे ही गाने लगता हूं तो खुदा से जुड़ जाता हूं। लोग हज पर जाते हैं पर मुझे खुदा ने खुद गायकी बख्शी है इसलिए यहीं एक रास्ता है जो मुझे खुदा से जोड़ता है।' 106 साल की उम्र में जब हाथ और पैर की आधी उंगलियां गल गई हों तब भी गायकी के लिए अपनी आशिकी बयां करते हुए ये हैं उस्ताद अब्दुल राशिद खान। शनिवार शाम टैगोर थिएटर में पद्म भूषण से नवाजे गए राशिद चंडीगढ़ आर्ट्स एंड हेरिटेज फेस्टिवल में अपनी प्रस्तुति देने पहुंचे। उन्होंने बातचीत में क्लासिकल सिंगिंग से जुड़े अपने लंबे सफर के बारे में कुछ दिलचस्प बातें बताईं। तानसेन की 23वीं पीढ़ी के गायक राशिद को संगीत उनके पिता छोटे युसुफ खान साहब से सीखने को मिला।
दो बार दिया जा चुका है जहर
राशिद ने कहा कि वह करीब पचास साल पहले कोलकाता के पास खागरा बैरमपुर गांव में वह एक प्रस्तुति देने पहुंचे। वहां उन्हें एक लोकल गायक के साथ जुगलबंदी करनी थी। जो एक मुकाबले में तब्दील हो गया। मुकाबले में जीत उनकी हुई तो उस गायक ने होटल के वेटर के साथ मिलकर उनके खाने में पारा डाल दिया। खाना खाने के बाद राशिद कई दिनों तक बीमार पड़े रहे। साथ ही उनकी उंगलियां भी गलने लगी। राशिद ने बताया कि दूसरी बार उन्हें अहमदाबाद में भी जहर दिया गया।
राग मल्हार से असल में कर चुका हूं बारिश
रागों से बारिश या दिया जला देने वाले चमत्कार से जुड़े एक सवाल पर राशिद ने बताया कि यह बात सच है। दो साल पहले मैं चंडीगढ़ में प्रस्तुति देने आया था और राग मल्हार पेश किया, प्रस्तुति के दौरान ही बारिश शुरू हो गई और स्टेज तक बूंदें बरसने लगी थीं।
पांच बजे उठते हैं और संगीत शिक्षा देते हैं
राशिद के नाती बिलाल खान ने बताया की वे सुबह पांच बजे उठ जाते हैं। उन्हें सबसे पहले चाय और हुक्का चाहिए। इसके बाद वह नाश्ता करते हैं जो बिल्कुल लाइट होता है। सुबह 11 बजे से दोपहर 3.30 बजे तक आईटीसी संगीत रिसर्च एकेडमी में बच्चों को पढ़ाते हैं और दोपहर को खाना नहीं खाते। रात दस बजे डिनर करते हैं। साथ में हुक्का जरूर रखते हैं।
आजकल के युवाओं को चार महीने में ही गायक बनना होता है
राशिद कहते हैं कि आजकल के युवाओं को चार महीने में ही गायक बनना होता है, हमारे समय में संगीत एक साधना होती थी, दो महीने तक पिताजी सिर्फ एक धुन पर काम करवाते थे। याद है जब एक दिन पिताजी के कहे बिना मैंने दूसरी धुनों का रियाज करना शुरू कर दिया। वे जैसे ही घर आए और एक बात पूछी की क्या पिछली धुन में माहिर हो गए जो नई धुन पकड़ ली है। उस दिन के बाद से कभी गायकी सीखने के लिए जल्दबाजी नहीं दिखाई। देश और विदेशों में परफॉर्मेंस दी है, लेकिन कभी फिल्मों की तरफ रुख नहीं किया। उन्होंने कहा कि घर में फिल्म की दुनिया में जाने की इजाजत नहीं है और ही किसी को जाने का शौक, हालांकि कई स्टूडेंट्स सीख कर बॉलीवुड की राह पर निकल पड़े हैं।