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हरियाणा विधानसभा चुनाव में, अब हुड्डा के सामने खुद को साबित करन की चुनौती

7 वर्ष पहले
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चंडीगढ़। हरियाणा विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण में जिस तरह मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा सबसे बडे़ बाजीगर बन कर उभरे हैं। स्पष्ट है कि हरियाणा में तीसरी बार कांग्रेस की सरकार बनाने का दावा कर मैदान में उतरने वाले भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कांग्रेस का हरियाणा में भविष्य तय करेगें। हुड्डा पर न केवल पार्टी की नय्या पार लगाने की जिम्मेदारी है बल्कि पार्टी के भीतर अपने कद को स्थापित करने की चुनौती भी है।

हरियाणा विधानसभा चुनाव में पाटियों में वर्चस्व की जंग चल रही है तो संगठन के भीतर भी खुद को शीर्ष पर ले जाने की जंग छिड़ी हुई है। इस उठापटक से बा-खबर शीर्ष नेतृत्व को यह एहसास है कि हुड्डा हरियाणा का जाट चेहरा है। उनकी उपेक्षा की गई तो हरियाणा के जाट मतदाताओं को झुकाव इंडियन नेशनल लोकदल की ओर हो सकता है। लेकिन शीर्ष नेतृत्व शक्ति संतुलन बनाने के लिए तंवर को लेकर आया था।
फिलहाल भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पास राजनीतिक अनुभव तो है लेकिन चुनावी रण में युवा जोश यानी प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर का युवा चेहरा नहीं है। टिकट वितरण में खुद की सुनवाई न किए आरोप लगाते हुए देख प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर के दिए इस्तीफे को भले ही शीर्ष नेतृत्व ने मंजूर नहीं किया लेकिन प्रत्याशियों की सूची पर हस्ताक्षर न कर तंवर ने स्पष्ट कर दिया कि चुनावी रथ के पहिए से युवा चेहरा जुदा हो गया है।

तंवर की कमजोरियों ने भी किया संगठन को कमजोर
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के करीबी प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर अशोक तंवर को ऐसे समय में हरियाणा में प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई जब पार्टी के बडे़ नेता सांसद राव इंद्रजीत, चौधरी धर्मबीर पार्टी छोड़़ चुके थे। कुमारी शैलजा, किरण चौधरी, कैप्टन अजय सिंह यादव, चौधरी वीरेंद्र सिंह समेत कई विधायक नेतृत्व परिवर्तन की मांग का झंडा लिए खड़े थे। तंवर पर जिम्मेदारी इस बिखराव को समेटने की थी। इस बीच लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 8 सीटें गवां सिर्फ दीपेंद्र हुड्डा की सीट बच पाई। खुद तंवर अपनी सीट नहीं बचा पाए लेकिन हार के लिए सीएम को जिम्मेदार ठहराया।
विधानसभा चुनाव सिर पर थे तब तंवर ने कांग्रेस कमेटी की सभी ब्लाक, जिला कमेटियां और प्रकोष्ठ भंग कर दिए। हुड्डा खेमा इससे आहत था। तंवर लोस चुनाव बाद राज्यसभा सांसद चौधरी विरेंदर सिंह और अवतार सिंह भडाना को भी नहीं मना पाए।

शैलजा को साधने की कोशिश
भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने तंवर से बढ़ती दूरियों के बीच अब कुमारी शैलजा को साधने की कोशिश की है। लिहाजा अंबाला विधानसभा सीट से राज्यसभा सांसद कुमारी शैलजा खेमे से हिम्मत सिंह, उकलान विधानसभा सीट से नरेश सेलवाल और साढौरा विधानसभा क्षेत्र से राजपाल भुखड़ी को टिकट प्रदान किया। लेकिन दोस्ती के इस बढ़े हाथ पर शैलजा कितना भरोसा करती है?

इसलिए बढा तंवर से विवाद
तंवर रतिया से जरनैल सिंह, उकलाना से नरेश कुमार, हांसी से विनोद भ्याना, बरवाला से रामनिवास घोडेला, नारनौल से राव नरेंद्र सिंह, भिवानी खेड़ा से रामकिशन फौजी की टिकट के खिलाफ थे। तंवर का सीएम से तकरीबन बीस सीटों पर विवाद था।

हुड्डा की चुनौती
संगठन कमजोर, जिला एवं ब्लाक कमेटियां भंग हैं, सिर्फ प्रभारियों का सहारा, उनमें कई स्वयं प्रत्याशी।
विपक्ष के विकास कार्य में क्षेत्रवाद का आरोप, यह आरोप पार्टी के भीतर से भी जब-तब उठता रहा।
एक दशक से हरियाणा में मुख्यमंत्री हैं लिहाजा प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर चुनौती बन खड़ी है।
पार्टी में बगावत और भीतरघात का खतरा बढा, विरोधियों का बागियों को मिलेगा समर्थन।