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पंजाब के नौजवानों को नहीं मिला साइंस में मौका

7 वर्ष पहले
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चंडीगढ़। पंजाब का इतिहास रहा है जंग का। बाबर से लेकर उसकी छठी पीढ़ी तक बाहरी हमलावारों और जंग को सहते रहे पंजाबी साइंस और एजुकेशन में पिछड़ गए हैं। वह दर्शक रहे लेकिन लेखक नहीं। पंजाब यूनिवर्सिटी में शनिवार की शाम को कॉलेज भवन का उद्धघाटन करते हुए ये अल्फाज थे ज्ञानपीठ अवार्डी गुरदियाल सिंह का।
वह पीयू के सीनेटर भी हैं। 32 कमरों वाले कॉलेज भवन का निर्माण खासतौर पर कॉलेज के टीचर्स और प्रिंसिपल आदि के लिए किया गया है। सिंह ने इस बात पर अफसोस जताया कि जंगे आजादी में सबसे ज्यादा योगदान देने वाले पंजाब के युवाओं को बंगाल और साउथ इंडियन के युवाओं की भांति साइंस में आगे बढ़ने का मौका नहीं मिल सका है।
प्रोग्राम की अध्यक्षता की सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब के चांसलर और पीयू पटियाला एवं पीएयू लुधियाना के वाइस चांसलर डॉ एसएस जौहल ने। डीन काॅलेज डवलपमेंट काउंसिल (डीसीडीसी) प्रो नवल किशोर ने मंच से वादा किया कि पंजाब यूनिवर्सिटी ने साइंस में भी पंजाब को बेस्ट बनाने के लिए प्रयास शुरू कर दिए हैं। उना ये ख्वाब जरूर पूरा होगा।

कॉलेज भवन के उद्घघाटन के बाद महाराजा हंसराज सेमिनार हॉल का उद्धघाटन किया डीएवी मैनेजमेंट के प्रेसिडेंट और पीयू के सीनेटर पूनम सूरी ने। वीसी प्रो अरुण ग्रोवर भी इस मौके पर मौजूद थे।