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हिमाचल के कुल्लू जिला में रघुनाथ के मंदिर से अरबों की मूर्तियां चोरी

7 वर्ष पहले
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(मंदिर का आसन जहां भगवान की मूर्तियां थी विराजमान)
चंडीगढ़, कुल्लू। पड़ाेसी राज्यों पंजाब व हरियाणा के आस्था के केंद्र भगवान रघुनाथ जी के कुल्लू स्थित प्राचीन मंदिर से उनकी मुख्य मूर्ति सहित पांच अष्टधातु की दुर्लभ मूर्तियां चोरी हो गई हैं। मंदिर में सिर्फ माता सीता की ही एकमात्र मूर्ति बच पाई बाकि तमाम मूर्तियों सहित मंदिर से पूजा अर्चना के सोने चांदी के सामान और आभूषण को चोरों ने समेट लिया है। यह घटना सोमवार रात 8 से मंगलवार सुबह पौने आठ बजे के बीच हुई है। चोरी की घटना का पता उस समय चला जब सुबह पौने आठ बजे मंदिर का पुजारी पप्पू पूजा करने के लिए मंदिर में प्रवेश हुआ। जब उसने मंदिर में प्रवेश किया तो वह हक्का बक्का रह गया और उसने तुरंत इसकी सूचना रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह को दी। चोरी हुई इन मूर्तियों व आभूषणों की कीमत अरबों में आंकी जा रही है।
उसके बाद एक के बाद एक मंदिर में कारकूनों और हारियानों ने दस्तक दी और पुलिस को भी इसकी सूचना दी। अब तक मिली जानकारी के अनुसार रघुनाथ की मूर्ति के अलावा हनुमान, सालीग्राम, नरसिंह की अष्टधातु की मूर्ति के अलावा गणेश की चांदी की मूर्ति के साथ करीब एक किलोग्राम सोने के आभूषण और अन्य चांदी के पूजा अर्चना का सामान चोरी हो गया है।
पुलिस ने सील किया मंदिर और रास्ते
घटना की सूचना मिलते ही प्रशासन की ओर से कार्यकारी उपायुक्त एवं एडीएम विनय ठाकुर, कुल्लू के एसपी सुरिंद्र वर्मा, एएसपी निहाल चंद सहित पुलिस दल मौके पर पहुंचा और मामले की छानबीन शुरू कर दी है। एसपी कुल्लू ने कहा कि उन्होंने सूचना मिलते ही पूरे हिमाचल प्रदेश के पुलिस थानों में इसकी सूचना दे दी है और प्रदेश के तमाम बैरियरों को सील कर दिया गया है। जबकि मंदिर को भी पुलिस ने सील कर दिया है और मंडी से फोरेंसिक टीम को भी बुलाया गया है।
ऐसे दिया घटना को अंजाम
चोरों ने मंदिर के पीछे से दीवार में लगे सरिए के सहारे छत पर चढ़ने के बाद छत पर लगे पत्थर के स्लेट को निकाला और उसके बाद स्लेट के नीचे लगे तख्ते तो काटकर अंदर घुसे। फिर मंदिर की ऊपरली मंजिल से फर्श का एक फटा तोड़ दिया। उसके बाद रस्सी के सहारे आदमी को नीचे उतारा गया और मंदिर के अंदर चोरी की इस घटना को अंजाम दिया। घटना स्थल पर का मुआयना करने पर पुलिस ने यह पाया कि यह कारनामा किए एक या दो आदमी का नहीं है इसमें तीन से अिधक लोग संलिप्त हो सकते हैं। जिन्होंने इस घटना को पूरे सुनियोजित तरीके से घटना को अंजाम दिया है।
पुलिस ने सबूतों को कब्जे में लिया
पुलिस दल ने मौके पर पहुंचकर घटना स्थल पर मिले सबूतों को अपने कब्जे में ले लिया है। पुलिस के हाथ वह रस्सी भी लगी है जिसे चोरों ने इस घटना को अंजाम देने के लिए इस्तेमाल किया था। उसके बाद मंदिर के तमाम हिस्से को सील कर दिया है और फोरेंसिक टीम भी घटनास्थल पर पहुंच चुकी है जो छानबीन और फिंगर प्रिंटस लेने में जुट गई है। पुलिस ने डॉग स्कार्ट को भी घटनास्थल पर पहुंचा दिया है और छानबीन शुरू कर दी है।
ये मूर्तियां और सामान चोरी
भगवान रघुनाथ की अष्टधातु की मूर्ति तीन इंच लंबी हनुमान की एक मूर्ति अष्टधातु
नरसिंह भगवान की अष्टधातु की शिला सोने की डिब्बी सहित
सालीग्राम की अष्टधातु की मूर्ति सोने की डिब्बी सहित
गणेश की मूर्ति पांच इंच लंबी चांदी की
चांदी की चरण पादुकाएं एक जोड़ी
चांदी के कटोरे दो
चांदी की आंचमानी एक
शंख का स्टेंड चांदी का एक
चांदी तस्की एक
चांदी की मसूद(ज्योत) एक
चांदी का पीडू एक
चांदी के लोटे दो
चांदी का धूप स्टेंड एक
अष्टधातु की घंटी एक
रघुनाथ के गले में सोने का हार एक
इससे पहले भी हुई थी चोरी
भगवान रघुनाथ के इस मंदिर में इससे पहले 21 जनवरी, 2014 को भी चोरों ने मंदिर के पीछे की दीवार को तोड़कर चोरी की घटना को अंजाम दिया था और उस दौरान लगभग 40 किलोग्राम चांदी और सोने के आभूषण चरण पादुका, झारियां, कटाेरे, आचवनी, आरती की कटोिरयां, अर्ग पात्र, कलश स्टेंड, जल का बाटू आिद सामान चुराया था। लेकिन पुलिस ने करीब एक डेढ़ हफ्ते तक इस मामले की छानबीन की थी लेकिन उसके बाद इस छानबीन को ठंडे बस्ते में डाल दिया। लिहाजा, इस मामले में पुलिस चोरों तक पहुंचने में नाकाम सावित हुई थी। लेकिन अब फिर से इसी मंदिर को तारगेट किया और उसी तकनिक से चोरी की घटना को अंजाम दिया जिस तरह से पहले चोरी की थी।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है रघुनाथ
भगवान रघुनाथ जी अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हैं और कुल्लू का ऐतिहासिक दशहरा उनके आगमन के बिना शुरू नहीं होता इसलिए भगवान रघुनाथ जी का महत्व सिर्फ कुल्लू और हिमाचल प्रदेश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी है। दशहरा के दौरान भवान रघुनाथ के दर्शन् के लिए जहां देश विदेश से लोग आते हैं तो वहीं जिला के तमाम गांव के देवी देवता भी उनसे मिलने के लिए पहुंचते हैं। भगवान रघुनाथ जी इस दौरान एक रथ में सवार होकर भव्य यात्रा में भाग लेते हैं जो दुनिया में अलग ही पहचान बनाए हुए हैं। कुल्लू दशहरा उत्सव का इतिहास करीब साढ़े तीन सौ वर्ष से अधिक पुराना है। दशहरा के आयोजन के पीछे भी एक रोचक घटना का वर्णन मिलता है। इसका आयोजन सत्रहवीं सदी में कुल्लू के राजा जगत सिंह के शासनकाल में आरंभ हुआ।
ऐसे कुल्लू पहुंचे थे रघुनाथ
राजा जगत सिंह ने वर्ष 1637 से 1662 ईस्वी तक शासन किया। उस समय कुल्लू रियासत की राजधानी नग्गर हुआ करती थी। कहा जाता है कि राजा जगत सिंह के शासनकाल में मणिकर्ण घाटी के गांव टिप्परी में एक गरीब ब्राह्मण दुर्गादत्त रहता था। उस गरीब ब्राह्मण ने राजा जगत सिंह की किसी गलतफहमी के कारण आत्मदाह कर लिया। गरीब ब्राह्मण के इस आत्मदाह का दोष राजा जगत सिंह को लगा। इससे राजा जगत सिंह को भारी ग्लानि हुई और कई इतिहासकार तो बताते हैं कि इस दोष के कारण राजा को एक असाध्य रोग भी हो गया था। दामोदर दास वर्ष 1651 में श्री रघुनाथ जी और माता सीता की प्रतिमा लेकर गांव मकड़ाह पहुंचे। माना जाता है कि ये मूर्तियां त्रेता युग में भगवान श्रीराम के अश्वमेघ यज्ञ के दौरान बनाई गई थीं। वर्ष 1653 में रघुनाथ जी की प्रतिमा को मणिकर्ण मंदिर में रखा गया और वर्ष 1660 में इसे पूरे विधि-विधान से कुल्लू के रघुनाथ मंदिर में स्थापित किया गया। राजा ने अपना सारा राज-पाट भगवान रघुनाथ जी के नाम कर दिया तथा स्वयं उनके छड़ीबदार बने। कुल्लू के 365 देवी-देवताओं ने भी श्री रघुनाथ जी को अपना ईष्ट मान लिया। इससे राजा को कुष्ट रोग से मुक्ति मिल गई।
और फिर शुरू हुई दशहरा उत्सव मनाने की परंपरा
श्री रघुनाथ जी के सम्मान में ही राजा जगत सिंह ने वर्ष 1660 में कुल्लू में दशहरे की परंपरा आरंभ की। तभी से भगवान श्री रघुनाथ की प्रधानता में कुल्लू के हर-छोर से पधारे देवी-देवताओं का महा सम्मेलन यानि दशहरा मेले का आयोजन अनवरत चला आ रहा है। यह दशहरा उत्सव धार्मिक, सांस्कृति और व्यापारिक रूप से विशेष महत्व रखता है। इस बार भी इस उत्सव के लिए देश के कौने कौने से व्यापारियों ने डेरा डाल दिया है और देवी देवता भी ढालपुर मैदान में पहुंचने शुरू हो गए हैं। लिहाजा, सोमवार सुबह से ढालपुर पूरी तरह से देवमय होगा और ढालपुर सात दिनों के लिए देवलोक बन जाएगा।
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