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चंडीगढ़ में मिली थी कोठी, पायलेट गाड़ी, फिर भी होती थी हुकम सिंह को घुटन

7 वर्ष पहले
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चरखी दादरी (भिवानी) . प्रदेश के पूर्व सीएम मास्टर हुकम सिंह नहीं रहे। गुरुवार शाम करीब 6 बजे गुडग़ांव के मेदांता सिटी अस्पताल में उनका देहांत हो गया। शुक्रवार को उनका शव उनके निवास स्थान चरखी दादरी लाया गया। यहां अंतिम दर्शनों के बाद गामड़ी स्थित रामबाग में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनके सम्मान में 28 फरवरी तक राजकीय शोक रहेगा। नेशनल अचीवमेंट सर्वे (एनएएस) की परीक्षा भी अब 28 फरवरी को होगी। 28 फरवरी 1926 को जन्मे हुकम सिंह ने 17 जुलाई 1990 को प्रदेश के सीएम बने थे।

मास्टर जी ने कभी नहीं की रौब की राजनीति...

बुधवार को पेट दर्द की शिकायत के बाद हुकम सिंह को वेदांता अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। गुरुवार को उपचार के दौरान उनका देहांत हो गया। पूर्व सीएम मास्टर हुकम सिंह का राजनीति सफर काफी लंबा रहा है, उन्होंने अपने राजनीति सफर में कई बड़े नेताओं के साथ मिलकर विकास कार्य किए। हुकम सिंह ने राजनीति की शुरूआत राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश, ताऊ देवीलाल जैसे बड़े नेताओं के साथ रहे। पूर्व सीएम के करीबी रहे डीपीआरओ कमल फौगाट ने बताया कि हुकम सिंह बड़े नेता होने के बावजूद भी जीवन काफी साधारण तरीके से बिताया और वह हमेशा आम लोगों से जुड़े रहे।

चंडीगढ़ में मिली थी कोठी, पायलेट गाड़ी...

पूर्व सीएम हुकम सिंह के दोस्त सहजराम नंबरदार ने बताया कि हुकम सिंह पुराने सिविल अस्पताल को 50 बेड बनवाना चाहते थे। पुराने सिविल अस्पताल को उठाकर लोहारू रोड स्थित उदम सिंह जैन अस्पताल में उन्हें स्थानांतरित किया गया था। जिससे हुकम सिंह काफी दुखी हुए थे। शहरवासियों को अपना उपचार करवाने के लिए दो किलो मीटर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है इसलिए वह दोबारा पुराने सिविल अस्पताल का अपग्रेड कर उसे 50 बेड अस्पताल बनवाना चाहते थे।

सहजराम नंबरदार ने बताया कि करीब एक साल पहले पूर्व सीएम हुकम सिंह को चंडीगढ़ में सरकारी कोठी, लाल बत्ती वाली टोयोटो गाड़ी, पायलेट गाड़ी सभी सुविधाएं मिली थी। जिसके बाद हुकम सिंह चंडीगढ़ चले गए, लेकिन वहां उन्हें घुटन महसूस होने लगी और दोबारा अपने भाई चारे लोगों के बीच रहने लगे। सहजराम ने बताया कि हुकम सिंह ने आकर मुझ से कहा था कि मुझे रौब नहीं अपना भाईचारा चाहिए। अब वह बचा जीवन अपने घर भाईचारे में बिताना चाहते थे।

राममनोहर से सीखे राजनीति के गुर

मास्टर जी डॉ. राममनोहर लोहिया के भक्त रहे हैं। उनसे ही उन्होंने राजनीति के गुण सीखे थे। उनका मानना था कि उस समय में नेता लोग सिद्धांत और मूल्यों की राजनीति करते थे। ऐसा नहीं था किसी एक को फायदा पहुंचाने के लिए हमने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उस समय की राजनीतिकार गरीब, मजदूर और किसान के लिए सोचते थे। जो वर्ग निम्न था उसको ऊपर उठाने के लिए प्रयास किए जाते थे। उनका कहना था कि उनके समय की राजनीति में नेता लोग लड़ाइयां लड़ते थे।