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डाउनलोड करेंचंडीगढ़। जीवन जैसा है उसी रूप में स्वीकार करने पर ही यहां जीवित रहा जा सकता है। यर्थाथ का सामना करके ही जीवन पथ पर मनुष्य चल सकता है और ऐसा हो नहीं सकता कि मनुष्य के सामने मुसीबतें ना आएं और सामना न करना पड़े ऐसे लोग निराश होते है। इस निराशा का कारण बहुत कुछ तो यथार्थ को स्वीकार न करना है। ये प्रवचन मुनिश्री विनय कुमार अलोक ने अणुव्रत भवन सेक्टर 24 में समायोजित सभा में दिए।
मुनि ने कहा कि निराशा का मनुष्य के दृष्टिकोण से अधिक संबंध होता है। मनुष्य को जैसी भावनांए होती है वैसी ही उसे प्रेरणा मिलती है। जिन लोगों को दृ़ष्टिकोण व भावनाएं स्वार्थ प्रदान होती है, जो अपने ही लाभ के लिए जीवन जीते है उनके निराशा असंतोष अवसाद ही परिणाम में मिलता है। यहा परम सत्य है कि जिसके मन में सेवा परामर्थ व जनकल्याण की भावनाएं होती है वे आशा उत्साह और प्रसन्नता से भरे रहते है। हम परसेवा करके निराशा से बच सकते है। कैसी भी विषम परिस्थित आ जाए उत्साह सदैव हमारा सहायक सिद्ध होता है। उत्साह का अर्थ है अपनी मान्यताओं के प्रति दृढ़ता। हम जो कहते है उसके कितने अंशो में पूरा कर सकते है इससे उस कार्य के प्रति विश्वास प्रकट होता है और उसी के अनुरूप प्रभाव भी उत्पन्न होता है।
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