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प्रश्न पूछने की बजाए सॉल्व करने का चैलेंज दें

8 वर्ष पहले
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चंडीगढ़। बेसिक, अप्लाइड और टेक्निकल के बीच साइंस को बांटने की जरूरत नहीं है। साइंस का अर्थ है प्रॉब्लम को सॉल्व करने की क्षमता। यह कहना था डॉ गिरीश साहनी का। वह पंजाब यूनिवर्सिटी के आई सीएसएसआर में इंडियन टेक्नोलॉजी डे पर विशेष लेक्चर दे रहे थे। इसकी अध्यक्षता पीयू के वाइस चांसलर प्रो अरुण ग्रोवर ने की।


इंस्टीट्यूट ऑफ माक्रोबियल टेक्नोलॉजी (इमटेक) मोहाली के डायरेक्टर डॉ साहनी ने कहा कि साइंटिस्ट्स को अपनी लिमिट्स से आगे सोचना होगा। अपने स्टूडेंट्स में साइंटिफिक एटीट्यूड पैदा करने के लिए हम उन्हें प्रश्न पूछने को कहते हैं। यह फंडा पुराना हो गया। बेहतर है कि हम सबके सामने एक प्राब्लम रखते हुए उसे सॉल्व करने को कहें।

इससे जो सजेशन आएंगे वह रिसर्च को नई दिशा देंगे। इमटेक की ओर से इंडस्ट्री को उपलब्ध कराई गई तकनीक का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पहले लोगों में विश्वास बनाएं, उसके बाद इंडस्ट्री आपको पैसा उपलब्ध कराती है। इंटरडिसिप्लरी वर्क की जरूरत है। बेसिक साइंटिस्ट ने अगर एक चीज को खोजा है तो उस के प्रभाव और आगे उसकी प्रोसेसिंग और मार्केटिंग भी साथ ही की जाए। हम तकनीक में इसलिए मास्टर हुए हैं क्योंकि वह अपनी नई खोज को ही आगे और बेहतर बनाने के लिए छोटे-छोटे बदलाव करते रहते हैं। प्रश्न पूछ, रिसर्च पेपर छाप कर ही इतिश्री करना ठीक नहीं है। साइंस का मतलब प्रॉब्लम सॉल्व करना है। वाइस चांसलर प्रो अरुण ग्रोवर ने भी इंटरडिसिप्लनरी कम्यूनिकेशन को जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी मेंं बेसिक साइंसेज के एक्सपर्ट हैं तो यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल साइंसेज और यूनिवर्सिटी बिजनेस स्कूल भी है। इसलिए आइडिया से लेकर मार्केटिंग तक का इंतजाम पीयू मे हैं।


--- कौन हैं प्रो साहनी : इमटेक के डायरेक्टर प्रो साहनी के प्रोजेक्ट की वजह से दिल की बी मारियो में क्लॉट बस्टर के तौर पर प्रयोग होने वाली दवा इस समय सात हजार रुपये प्रति डोज की बजाए 450 रुपये प्रति डोज में उपलब्ध है। पहले यह सिर्फ विदेश से आता था जब इसकी कीमत 7 हजार रुपये प्रति डोज थी। सेकंड इनोवेशन में यह 5 हजार से दो हजार रुपये में और थर्ड इनोवेशन में यह 450 रुपये प्रति डोज में उपलब्ध हो गया है। इस पर खर्च सिर्फ सौ रुपये आता है।