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अब मॉल में भी बिकेगी मिठाई 37 साल पुराने सिंधी स्वीट्स ने अपने छठे आउटलेट के साथ एंट्री मारी एलांते मॉल में - 1

8 वर्ष पहले
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चंडीगढ़। 1976 में शहर के बीचों-बीच सेक्टर-17 में सिंधी स्वीट्स का पहला आउटलेट खुला था। तब आसपास कोई भीड़, कोई दुकान न होती थी। आज शहर में इतने मॉल, इतने ब्रैंड्स आ गए हैं पर इस वेंचर के मालिक नीरज बजाज मानते हैं कि 'लड्डूओं' की मांग तब तक बनी रहेगी जब तक इंडियन कल्चर जिंदा है। सोमवार को सिंधी स्वीट्स का छठा आउटलेट इंडस्ट्रियल एरिया के एलांते मॉल में खुला है। यूं तो पहले से डीएलएफ मॉल में भी सिंधी का एक आउटलेट है, पर वहां सिर्फ फास्ट फूड ही सर्व होता है। तो सीधे तौर पर शहर के किसी मॉल में खुलने वाली ये पहली मिठाई की दुकान है। साथ ही कुछ नई चीजों के मेन्यू में जुडऩे से यहां फास्ट फूड में भी कई ऑप्शन मिलेंगे।


इससे पहले सिंधी के सेक्टर-17 में दो, सेक्टर-8, सेक्टर-37 और डीएलएफ सिटी सेंटर में एक-एक आउटलेट मौजूद हैं। एलांते मॉल में एक तरफ जहां मैक डोनल्ड्स, पिज्जा हट, केएफसी जैसे इंटरनेशनल ब्रैंड मौजूद हैं, वहीं सिंधी वालों को अपनी खास जगह बनाने पर पूरा भरोसा है। नीरज ने कहा, 'सब ग्लोबलाइजेशन का खेल है जी। लोगों के स्वाद में फर्क नहीं आया, स्टाइल में जरूर आ गया है। उसी से तालमेल बिठाने के लिए हमनें वक्त-वक्त पर खुद को अपडेट किया है।

हालांकि एलांते मॉल में आउटलेट खोलने की कॉस्ट काफी है पर यहां चीजों के रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया है। बल्कि नीरज ने तो ये तक कह दिया कि पड़ोस के आउटलेट हमारे कम रेट्स की वजह से सकते में हैं। इस आउटलेट को आर्किटेक्ट नवदीप शर्मा ने खूबसूरती से डिजाइन किया है। नीरज के बेटे अभिषेक भी इस मौके पर मौजूद थे। उन्होंने कहा, 'आजकल ट्रेंड सेल्फ-सर्विस का है क्योंकि बिजनेस करने वाले चाहते हैं कि उनका टेबल जल्दी से खाली हो जाए। पर हमारा मानना है कि खाने का वक्त ही तो है जब कोई सुकून से बैठता है। ऐसे में अगर एक एक्स्ट्रा चपाती के लिए उसे बार-बार उठना पड़े तो मजा ही क्या। इसलिए हमेशा टेबल सर्विस बेहतर करने पर हमारा ध्यान है।


सिंध से चंडीगढ़ तक
बजाज परिवार का ये खानदानी बिजनेस है। नीरज ने बताया कि उनके दादा-परदादा पाकिस्तान के सिंध में मिठाइयों का बिजनेस करते थे। बंटवारे के बाद उनका परिवार यमुनानगर में आ बसा। 1976 में वे चंडीगढ़ आए और सिंधी स्वीट्स शुरू की। बताते हैं, 'उस वक्त हमारी दुकान से 30 बे बिल्डिंग दिखा करती थी। गिने-चुने सरकारी दफ्तर होते थे और पार्किंग में सिर्फ साइकिलें। मैंने शहर और शहरवासियों के स्टाइल को बदलते देखा है। जहां तक मीठे की बात है तो खुशी के मौके पर भी चॉकलेट या पेस्ट्री कोई नहीं मांगता। सब कहते हैं 'लड्डू कब खिलाओगेÓ।Ó इस परिवार से जुड़े कई लोग देश के दूसरे शहरों में भी मिठाई का बिजनेस करते हैं।